भारत सहित पूरे विश्व में हिंदू संप्रदाय के लोग कृष्ण जन्माष्टमी इस बार 14 अगस्त मनाएंगे। भगवान श्री कृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में यह त्योहार मनाया जाता है।
पुराणों के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण ने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अवतार लिया था। इसके बाद से इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। इस त्योहार को भारत में हीं नहीं बल्कि विदेश में भी हिंदू संप्रदाय के लोग पूरी आस्था के साथ मनाते हैं।
बताया जाता है कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में अत्याचारी मामा कंस के विनाश के लिए भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा में अवतार लिया था। इसलिए इस दिन मथुरा में काफी हर्षोउल्लास से जन्माष्टमी मनाई जाती है। दूर-दूर से लोग इस दिन मथुरा आते हैं।
इस दिन मथुरा नगरी पूरे धार्मिक रंग में रंगी होती है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है और झांकियां सजाई जाती हैं। इसके अलावा मंदिरों में रासलीला का आयोजन भी किया जाता है। नीचे दिए गए वीडियो के मुताबिक 5 हजार 243 वर्ष पूर्व भगवान श्री कृष्ण मध्य रात्रि में इस धरती पर अवतरित हुए थे।
जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने का भी विधान है। इस दिन व्रत रखने का हिंदू धर्म में काफी महत्व बताया गया है। बताया जाता है कि इस दिन व्रत रखने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
स्कंद पुराण के मुताबिक जो मनुष्य जानते हुए भी इस दिन व्रत नहीं रखता, वह जंगल में सृप होता है। लेकिन जो व्यक्ति विधि के अनुसार और पूरी आस्था के साथ इस दिन व्रत रखते हैं, उनके पास हमेशा लक्ष्मी स्थिर रहती है और बिगड़ते काम बन जाते हैं। क्या है व्रत विधि- व्रत की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करना चाहिए और इस दिन शारीरिक संबंध भी नहीं बनाने चाहिए। व्रत के दिन सुबह स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद जल, फल, कुश लेकर व्रत का संकल्प करें। संकल्प करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और पूजन करें। पूजा में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंदू, यशोदा, लक्ष्मी का नाम लेना ना भूलें। सोर्स:जनसत्ता
भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बदौलत भारत आज परमाणु महाशक्ति बन गया है। पहले परमाणु परीक्षण से लेकर मिसाइल टेक्नोलॉजी के जनक डॉ. कलाम अब इस दुनिया में नहीं रहे, लेकिन आज भी उनके दिखाए रास्ते पर चलकर दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइल बनाने में जुटे हैं
दरअसल, भारतीय वैज्ञानिक एक ऐसी मिसाइल पर काम कर रहे हैं, जो भगवान श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र की तरह अपने लक्ष्य को भेदकर वापस आ जाएगी। भारतीय वैज्ञानिकों को कई मायनों में सफलता भी मिल चुकी है।
बता दें कि इस बेहतरीन मिसाइल को तैयार करने का श्रेय डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम को दिया गया है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पूर्व राष्ट्रपति के पुराने नोट्स इस मिसाइल के निर्माण में काफी मदद कर रहे हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर सबकुछ ठीक रहा तो ब्रम्होस सीरीज की आने वाली मिसाइलें लक्ष्य भेदकर वापस लौटने वाली दुनिया की पहली मिसाइल बन जाएगी। आपको बता दें कि भारत के पास अभी तक सबसे लंबी दूरी तक मार करने वाली अग्नि-5 की मारक क्षमता 6000 किमी है, यानी इसकी जद में आधी दुनिया है।
ब्रह्मोस एरोस्पेस के सीईओ के अनुसार, पूरी दुनिया के पास अभी तक ऐसी मिसाइलें हैं, जो लक्ष्य भेदने के साथ वहीं पर समाप्त हो जाती हैं। लेकिन हम ठीक वैसी मिसाइल बना रहे हैं, जैसे सुदर्शन चक्र दुश्मन पर वार कर वापस लौट आता था।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने इन लाइनों से जिस दर्द को बयां करने की कोशिश की है वो इससे कहीं बड़ा है. वाकई 15 अगस्त की सुबह वो सुबह नहीं रही होगी जिसके लिए देश के युवाओं ने अपना सबकुछ न्यौछावर किया था. भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, आज़ाद ने इस भारत के सपने तो नहीं देखे होंगे.
सोचिए उस दर्द की तासीर जिसने गुझियों की थाली और सेवइयों के डोंगों की अदला-बदली रोक दी. जिसने हर शाम नुक्कड़ पर मिलने वाले दोस्तों की यारियां छीन लीं. जिसने मुसलमान भाइयों से उनकी हवेलियां हथिया लीं. जिसने हिन्दुओं के लिए लाहौर की गलियों की रोशनी ख़त्म कर दी.
हम ये शब्द लिख-पढ़ रहे हैं, मगर हज़ारों परिवारों ने ये सब सहा है. क्या आप नहीं सोचते कि ये सब क्यों हुआ. कैसे हुआ. कब हुआ. हम सब जानते हैं कि 15 अगस्त को देश आज़ाद हुआ. लेकिन देश के बंटवारे का ज़हरीला फैसला 18 जुलाई 1947 को ले लिया गया था.
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 18 जुलाई 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम को स्वीकृति मिली. इसकी नींव माउंटबेटन योजना ने रखी थी. इसमें देश की आज़ादी के बदले अंग्रेज़ों ने इसके दो टुकड़े करने की ठानी थी. इस काम के लिए चुना गया था लंदन के वकील सर सिरिल रेडक्लिफ को.
वो रेडक्लिफ जो कभी भारत नहीं आए थे. जिन्हें न यहां की संस्कृति की जानकारी थी न तहज़ीब का इल्म था. जो सिर्फ एक नक्शे पर लकीर खींचने आ रहे थे. उन्हें नहीं पता था कि वो दुनिया का बेहद स्याह फैसला लेने जा रहे हैं.
इस बंटवारे के तहत हिन्दू बहुल इलाके भारत में और मुस्लिम बहुल इलाके पाकिस्तान में शामिल किए जाने थे. देश के कई राज्यों को आज़ादी दी गई कि वो अपना पाला चुन लें. अधिकतर राज्यों ने धर्म के आधार पर देश चुना. विभाजन के बाद पाकिस्तान को संयुक्त राष्ट्र में नए सदस्य के रूप में शामिल किया गया और भारत ने ब्रिटिश भारत की कुर्सी संभाली.
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पर 18 जुलाई 1947 को मुहर लगी.
कौन लोग शामिल थे? अंग्रेज़ों ने फूट डालो-राज करो की नीति के तहत 1906 में मुस्लिम लीग को मान्यता दे दी. उस समय लीग के लगभग सभी सदस्य मुसलमानों के ऊंचे तबके से आते थे. इसी तरह 1915 में बनी हिन्दू महासभा भी हिन्दुओं के ऊंचे तबके की बपौती थी.
मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस अपने-अपने ‘राष्ट्रों’ पर नियंत्रण स्थापित करना चाहती थीं. कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का लक्ष्य आज़ादी पाना था. एक देश के लिए लक्ष्य अलग-अलग होंगे तो राहें मुश्किल ही होंगी. इसके बाद पंडित नेहरू ने 1937 में मुस्लिम लीग के सदस्यों को उत्तरप्रदेश की सरकार में शामिल करने से इनकार कर दिया.
इस इनकार ने चोट का काम किया. लीग में गुस्सा बढ़ रहा था. 1945 में शिमला सम्मेलन हुआ. इसमें वायसराय लॉर्ड वेवैल के साथ देश के बड़े नेताओं ने हिस्सा लिया. हालांकि यह सम्मेलन विफल रहा था. जिन्ना भी इस सम्मेलन में शामिल थे. ये वही जिन्ना हैं जिन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए मुस्लिम लीग के साथ लखनऊ समझौता करवाया था. लेकिन कांग्रेस से नाख़ुशी के बाद जिन्ना ने अलग देश की मांग कर ली. क्योंकि उन्हें लगने लगा कि भारत में मुसलमानों के साथ परायों जैसा बर्ताव हो रहा है.
जसवंत सिंह ने अपनी किताब ‘जिन्ना: इंडिया पार्टीशन इंडिपेंडेंस’ में जिन्ना को एक धर्मनिरपेक्ष नेता बताया है. उनका कहना है कि जिन्ना को अकारण ही खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
एक मीटिंग में नेहरू, माउंटबेटेन और जिन्ना.
किसने विरोध किया? विभाजन के लिए कई नेता तैयार नहीं थे. लेकिन निज़ामों ने विरोध करने वालों की एक न सुनी. आजादी के पूर्व तक बाबा साहेब अंबेडकर राजनीति में नहीं थे. दलितों के उत्थान के लिए लगातार काम रहे थे. लेकिन उनकी नज़र सियासत पर थी. वे लगातार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उनके बड़े नेताओं महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू की गलत और सही नीतियों की आलोचना कर रहे थे. मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना को भी उन्होंने नहीं बख्शा था. उन्होंने विभाजन का कड़ा विरोध किया था. वो देश को अखंड देखना चाहते थे. उन्होंने इस मुद्दे पर एक किताब ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ भी लिखी.
क्या बंटा? ब्रिटिश भारत की संपत्ति को दोनों देशों के बीच बांटा गया. माउंटबेटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपये देने की सलाह दी थी. भारत सरकार इसे टालती रही लेकिन गांधीजी ने अनशन कर यह राशि पाकिस्तान को दिलाई. इस वजह से कई लोग गांधी की आलोचना करते रहे हैं.
बंटवारे के बाद क्या हुआ विभाजन के बाद कई महीनों तक दोनों नए देशों के बीच लोगों की आवाजाही हुई. भारत से कई मुसलमानों ने डर और अपने मुल्क की चाहत में पलायन किया तो पाकिस्तान से हिन्दुओं और सिखों ने अपना घर छोड़ दिया. जो नहीं छोड़ना चाह रहे थे उन्हें हालातों ने मजबूर कर दिया.
लूटपाट, हत्याएं, बलात्कार जैसी तमाम घटनाओं ने इस तारीख को लोगों के ज़ेहन में काली स्याही पोत दी. कुछ अपनी दोस्ती रिश्तेदारी भूल गए, कुछ इसे बचाने के लिए जान से गए. बहन-बेटियों की लूट हुई. जिसका दंश लोग अबतक भूल नहीं पाए हैं. सीमा रेखाएं तय होने के बाद लगभग 1.45 करोड़ लोगों ने सीमा पार करके अपने ‘नए देश’ में शरण ली.
1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गए और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए. पंजाब और लाहौर ने सबसे ज़्यादा दर्द सहा. आज भी न जाने कितनी कहानियां अनसुनी हैं.
आज भी न जाने कितनी दास्तानों को लफ़्ज़ नहीं मिल सके. आंकड़ों की मानें तो इस बंटवारे में 20 लाख लोगों की जान गई. लेकिन ये सिर्फ आंकड़ा है. ट्रेनों में लाशों का जत्था, मोहल्लों में आगजनी और गांवों के पलायन में गई जानों की ठीक गिनती कर पाना नामुमकिन है.
फिल्मों में विभाजन इस त्रासदी पर देश-दुनिया पर कई उपन्यास लिखे गए. कहानियां गढ़ी गईं. फिल्में-डॉक्युमेंट्री बनाई गईं. यशपाल की ‘झूठा सच’, भीष्म साहनी की ‘तमस’, अमृता प्रीतम की ‘पिंजर’, खुशवंत सिंह की ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ और सलमान रुश्दी की ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ (आधी रात की सन्तानें) में जो दर्द दिखाने की कोशिश हुई है वो एक नमूना भर है.
पिंजर को फिल्म और तमस को दूरदर्शन का धारावाहिक भी बनाया गया. इसके अलावा ‘गरम हवा’, दीपा मेहता की ‘अर्थ’ (ज़मीन), कमल हसन की ‘हे राम’ भी भारत के विभाजन को दिखाती है. एक पंजाबी लड़की की जबरन मुसलमान के साथ शादी, लाहौर के ज़मीदार का भारत आकर पैसे-पैसे को तरसना, अपने एक साल के बच्चे को खो देना, पूरा का पूरा परिवार क़त्ल हो जाना, और ऐसे न जाने कितने हालात उस वक़्त एक साथ गुज़र रहे थे. इन सब को किसी फ़िल्म में समेट पाना मुमकिन ही नहीं है.
99 वे साल का एक कैदी आज जेल से आजाद हुआ। वह बिना सहारे चलने की स्थिति में नहीं था। जेल से बाहर उसे ना तो कोई लेने आया और ना ही उसके चेहरे पर आजादी की खुशी नजर आ रही थी। बस उसने इतना ही बोला, बाबूजी धीरे चलना। शायद उसका मतलब था कि जोश में एेसा काम नहीं करना चाहिए, जिससे बुढ़ापा जेल में कटे।
कोटा सेंट्रल जेल से आज 99 साल का रामचंद्र रिहा हुआ। बारां जिले के बापचा थाना इलाके में कान्याखेडी गांव में मामूली विवाद के दौरान हुई हत्या के मामले में रामच्रंद को उम्र कैद की सजा मिली थी। 11 साल तक फरारी काटने के बाद रामचंद्र गिरफ्तार हुआ था।
इसके बाद न्यायालय द्वारा सुनाई गई सजा के 16 साल उसने सेंट्रल जेल में कैदियों के बीच काटे। यहां आकर उसने खुद को अच्छे व्यवहार में ढाला और आज इसकी बदौलत रिहा भी हो गया।
खुली जेल के 60 कैदियों में सबसे उम्रदराज था ये...
रामचंद्रPC: amar ujala
रामचंद्र के अच्छे व्यवहार को देखते हुए जेल प्रशासन ने उसे खुली जेल में शिफ्ट कर दिया। वर्ष 2015 से खुली जेल में दो साल के अच्छे आचरण और उम्र को देखते हुए जेल प्रशासन ने उसे रिहाई के लिए प्रयास शुरू किए, जिसमें उन्हे सफलता मिली। पांच महीने पहले ही उसकी रिहाई के आदेश महानिदेशालय पुलिस से कोटा जेल प्रशासन को मिले।
कोटा खुली जेल में लगभग 60 कैदी अपने गुनाहों की सजा काट रहे हैं, जिसमें यह उम्रदराज कैदी रामचंद्र एक था। उम्र का बड़ा हिस्सा रामचंद्र ने जेल में गुजारा है, लेकिन रिहाई ने जेल के अनुभव के साथ बड़ा संदेश इस बुजुर्ग को देने के लिए मजबूर कर दिया। अपने गुनाह की माफी तो रामचंद्र मांग रहा है।
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"अपने पिता के बिना, मैं यहां नहीं हो सकती थी." - मारिया शारापोवा
''एक इंसान जो दूसरे को सबसे महान तोहफा दे सकता है, वह मेरे पिता ने मुझे दिया, उन्होंने मुझ पर विश्वास जताया'' - जिम वाल्वानो
''वह पिता एक बुद्धिमान पिता है जो अपने बच्चों को जानता है.'' - विलियम शेक्सपीयर
''मैं जीने के लिए तो अपने पिता का कर्जदार हूं.'' - एलेक्जेंडर महान
''मेरे पिताजी अपने पिताजी से डरते थे और मैं अपने पिताजी से डरता था पर मुझे यह नहीं समझ आता की मेरे बच्चे मुझसे क्यों न डरे.'' - लॉर्ड माउंटबेटन
''पिताजी ने मुझे बताया था कि दुनिया में दो तरह के लोग रहते हैं. एक देने वाले और दूसरे लेने वाले. लेने वाले भले ही अच्छा खा ले लेकिन देने वाले अच्छी तरह सोते है.''- मार्लो थोमस
''वह व्यक्ति जो अपने पिताजी से बदला ले, वह कुछ भी कर सकता है.'' - पीयरे कोर्नेले
''मेरे पिता असफल नहीं थे. वे एक अमेरिकी राष्ट्रपति के पिता थे.'' - हैरी एस
जहां एक तरफ बिहार में 12वीं के नतीजों में हुई धांधली ने वहां की शिक्षा व्यवस्था की कलई खोलकर रख दी। वहीं, उसी राज्य में ही एक गांव ऐसा भी है, जहां के बच्चे अपनी मेहनत के बलबूते पर अपना मुकाम हासिल कर रहे हैं। बिहार के गया जिले का पटवाटोली गांव बुनकरों की एक बस्ती है। यह गांव बिहार ही नहीं, देशभर में हर साल चर्चा का विषय बना रहता है। पटवाटोली गांव बुनकरों की आबादी के लिए जाना जाता है। 1992 से यह गांव ‘IIT हब’ बनकर उभरा है। यहां की 10 हजार की आबादी में से अब तक 300 से ज्यादा इंजीनियर निकल चुके हैं। इनमें से कई दुनिया के अलग-अलग देशों की बड़ी कंपनियों में उंचे पदों पर कार्य कर रहे हैं।
इस साल इस गांव के 20 छात्रों ने आईआईटी परीक्षा में कामयाबी हासिल की है। कई बच्चों के माता-पिता ने खुद भूखे पेट रहकर अपने बच्चों को पढ़ाया है। आज वह अपने बच्चों की सफलता से फुले नहीं समां रहे हैं।
मूलभूत सुविधाओं से परे अपना जीवन यापन कर रहे इस गांव के बच्चों को इंजीनियर बनने की प्रेरणा जीतेंद्र प्रसाद से मिली। जीतेंद्र प्रसाद सबसे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जो पटवाटोली से 1992 में आईआईटी में सिलेक्ट हुए। जितेंद्र प्रसाद 2000 में नौकरी करने अमेरिका चले गए। उनकी इसी सफलता ने पटवाटोली के छात्रों में इंजीनियर बनने की ललक जगाई कि मेहनत से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। बच्चों के परिवारवालों ने भी प्रसाद की कामयाबी को देख अपने बच्चों की शिक्षा पर ध्यान देना शुरू किया। शिक्षा के महत्व को जाना।
पूर्व इंजीनियर छात्र भी भविष्य में इंजीनियर बनने की चाह रखने वाले बच्चों की सहायता करते हैं। इसी दिशा में पटवाटोली के पूर्व इंजीनियरिंग छात्रों ने मिलकर नवप्रयास नाम से एक संस्था बनाई, जो IIT की परीक्षा देने वाले छात्रों को पढ़ाई में मदद करती है। इस पटवाटोली गांव ने आर्थिक मंदी का दौर भी देखा है। आर्थिक तंगी के बावजूद भी तब से लेकर अब तक अभाव में रहने वाले पटवाटोली गांव के बच्चे लगातार अपने इलाके का नाम रौशन कर रहे हैं और कई अन्य बच्चों को भी प्रेरित कर रहे हैं। सोर्स:TopYaps
दुनिया के बहुत से खूबसूरत और संपन्न शहरों के बारे में आप जानते ही होंगे, पर क्या आप जानते हैं कि प्राचीन समय में दुनिया का सबसे संपन्न और खूबसूरत शहर अपने भारत में ही था? यदि नहीं, तो आज हम आपको बता रहें हैं भारत के इस प्राचीन शहर के बारे में जिसके अवशेष आज भी इस शहर की खूबसूरती और संपन्नता के सबूत बने हुए हैं। भारत प्राचीन काल से ही संपन्न रहा है, भारत को अन्य देशों के लोग “सोने की चिड़िया” यू ही नहीं बुलाते थे। असल में भारत का इतिहास बेहद संपन्न रहा है। इसी क्रम में आज हम आपको बता रहें हैं एक ऐसे राज्य के बारे में जोकि अपने समय में विश्व का सबसे समृद्ध राज्य था और यहां लोग दूर-दूर से इसकी खूबसूरती और भव्यता को देखने के लिए आते थे, तो आइए जानते हैं इस शहर के बारे में।
विश्व में सबसे ज्यादा खूबसूरत और संपन्न भारत के इस शहर का नाम “हम्पी” है। आज भले ही यह शहर खंडर में तब्दील हो गया हो पर आज से 500 वर्ष पहले इस शहर में करीब 5 लाख लोग रहते थे और यह शहर इतना ज्यादा शक्तिशाली था कि 300 वर्षों तक इस पर आक्रमण करने की हिम्मत किसी भी देश में नहीं हुई। बहुत से लोगों का मानना है कि हम्पी ही रामायण काल का “किष्किंधा” नामक राज्य था।
14 वीं शताब्दी में यह शहर दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य की राजधानी बना था। सन् 1509 से 1529 तक यहां के राजा कृष्णदेव राय ने शासन किया था। इस शहर में स्थित विरुपाक्ष मंदिर के सामने ही हीरों का बाजार खुलेआम लगता था और देश विदेश के लोग यहां हीरे खरीदने के लिए आते थे। सन् 1565 में हुए ताली कोटा नामक युद्ध में इस शहर का विनाश हो गया था। इस शहर को 6 महीने तक लूटा गया था और उसके बाद में इस शहर को आग लगा दी गई थी। इस शहर के बचे अवशेषों पर रिसर्च करने के लिए आज भी आर्कियोलॉजिस्ट आते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस शहर की जमीन के अंदर में आज भी यहां का मूल राजभवन दफन है, इसलिए आर्कियोलॉजिस्ट विभाग के अधिकारी जगह-जगह पर खुदाई का कार्य भी करते रहते हैं। सोर्स:वाह गज़ब
हर एक छात्र के आंखों में परीक्षाओं में बेहतर अंक हासिल कर डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, आईएएस आदि बनने के ख्वाब होते हैं. कुछ छात्रों का यह सपना पूरा भी हो जाता है लेकिन कुछ छात्र ऐसे भी होते हैं जो टॉप करने के बाद दुनिया में कुछ अलग ही बनने के सपने देखते हैं.
कुछ ऐसे ही छात्रों में शुमार है 17 वर्षीय वार्शिल शाह का नाम. वार्शिल अहमदाबाद के मध्यम परिवार से आते हैं उन्होंने हाल ही में गुजरात बोर्ड द्वारा आयोजित 12वीं कक्षा की परीक्षा 99.9 फीसदी अंक हासिल कर सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है.
वार्शिल देश के बेहतरीन कॉलेजों में दाखिला लेकर अपना बेहतर करियर बना सकते हैं लेकिन उन्होंने अपने आगे के करियर की डगर खुद ही चुनी है.
वार्शिल ने किसी कॉलेज में एडमिशन लेने कि बजाए जैन भिक्षु बनने का फैसला किया है. वह आगामी आठ जून को जैन भिक्षु बनने के लिए दीक्षा लेने वाले हैं.
इस बारे में जानकारी देते हुए वार्शिल के चाचा नयनभाई सुठारी ने कहा कि दीक्षा कार्यक्रम गांधीनगर में आयोजित किया जाएगा. वैसे तो परीक्षा परिणाम उसकी उम्मीदों के अनुरूप है, लेकिन दुनिया में शांति की स्थापना के लिए यही रास्ता बेहतर है.
वार्शिल तीन साल पहले मुनि श्री कल्याण रत्न विजय जी के संपर्क में आया था. इसके बाद वह आध्यात्म की राह पर मुड़ गया. वार्शिल सफलता के लिए कड़ी मेहनत की बजाए शांत दिमाग से काम करना पसंद करता है. वह दीक्षा लेने के लिए अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने का इंतजार था.
पेशे से आयकर अधिकारी वार्शिल के पिता जिगरभाई और मां अमीबेन शाह अपने बेटे के इस फैसले से काफी खुश हैं. इतना ही नहीं वार्शिल की बड़ी बहन जैनिनी भी अपने भाई के फैसले के साथ है.
गौरतलब है कि 27 मई को आए गुजरात हायर सेकंडरी एजुकेशन बोर्ड के परीक्षा परिणाम में वार्शिल ने टॉप किया है.
डीपीएस सेक्टर 30 के स्टूडेंट हैं मिन्नातुल्ला. उन्होंने 93% से ज्यादा मार्क्स पाए हैं. मिन्नातुल्ला सारेगामापा लिटिल चैंप्स में भी आ चुके हैं. पांच भाई-बहनों वाले परिवार का खर्चा मिन्नातुल्ला के पिता चलाते हैं. जो फैक्ट्री से ब्रेड लाकर दुकानों में बेचते हैं.
मिन्नातुल्ला को डीपीएस में एडमिशन RTE कोटे के तहत मिला. उसके बाद उनकी सफलता का सारा क्रेडिट उन्हें ही जाना चाहिए क्योंकि जिन हालात में वो इतने नंबर ला रहे हैं वो आसान नहीं है. इस चीज का बहुत फर्क पड़ता है कि घर लौटकर आप किस माहौल में पढ़ाई करते हैं. मिन्नातुल्ला जैसे बच्चे थोड़ी कठिनाई में भी ये चीज सफलता के आड़े नहीं आने देते. ये बहुत अच्छी बात है.
अनूप कुमार
डीपीएस आरकेपुरम के अनूप कुमार ने 90% मार्क्स पाए. उनके नंबर मायने रखते हैं क्योंकि अनूप देख नहीं सकते. अनूप ह्युमनिटीज के छात्र हैं, इसमें भी एक पेंच है. अनूप को अर्थशास्त्र और मैथ्स छोडनी पड़ गई थी क्योंकि ब्रेल लिपि में पढ़ाई के लिए पर्याप्त साधन उन विषयों में नहीं थे.
वो बताते हैं कि मुझे अपने दो पसंदीदा विषय सिर्फ इसलिए छोड़ने पड़ गए, क्योंकि सीबीएसई हमें ब्रेल में स्टडी मटेरियल उपलब्ध नहीं करा पाई. अनूप को इतिहास में 100 नंबर मिले, पॉलिटिकल साइंस में 98, फिजिकल एजुकेशन में 97, समाज शास्त्र में 95. वहीं उनके नंबर इंग्लिश में थोड़ा सा कम रह गए. 77 नंबर मिले. अनूप अब डीयू में पॉलिटिकल साइंस पढ़ना चाहते हैं.
गीता कुमारी ऐसे ही गीता कुमारी भी हैं. बायो में उनके 95% हैं. गीता नोएडा के महामाया इंटर कॉलेज की छात्रा हैं. उनके पिता की कैंसर से मौत हो जाने के बाद उनके भाई ने सब्जियां बेच-बेचकर पढ़ाया. गीता ने बिना किसी ट्यूशन के सिर्फ इतने नंबर पाए.
हर्षिता हर्षिता नजफगढ़ के पास ढासा गांव में रहती हैं. उनके पिता मेहनत-मजदूरी करके घर चलाते हैं. वोकेशनल में पढ़ाई करके उन्होंने 93% नंबर पाए.
मजदूर की बेटी को भी अच्छी शिक्षा मिली तो उसने भी आसमान छू लिया। यही हमारी राजनीति है - शिक्षित राष्ट्र-समर्थ राष्ट्र। https://t.co/BgHFsPOxEc
दर्शना एम.वी. तमिलनाडु के कृष्णागिरी में दर्शना एम.वी. पढ़ती हैं. दाईं आंख पूरी तरह से दृष्टिबाधित है, वहीं बाईं आंख भी आंशिक रूप से ही देख पाती है. कॉमर्स की इस स्टूडेंट ने 96 से ज्यादा परसेंट पाए. और पूछने पर मीडिया को बताया कि आंख की कमजोर रोशनी कभी भी उनके आड़े नहीं आई.
ये बच्चे टॉपर भले न हों लेकिन इतने ज्यादा परसेंट लाना भी कम नहीं है. इस आंकड़े को छूने में कई छात्रों के पसीने छूट जाते हैं. भले उनके पास कितनी भी बुद्धि, समय, सुविधा और सहूलियतें हों. हर रोज़ जब अपने आस-पास के माहौल, शारीरिक सीमाओं , अभावों से गुजरना हो तो फोकस सिर्फ पढ़ाई पर लगाकर अंत में इतना बेहतर नतीजा देना आसान काम नहीं है. इन बच्चों की मेहनत की कद्र करनी चाहिए.
यहां हम बात कर रहे हैं 80 के दशक के उस खिलाड़ी की जो अपने करियर में एक बार भी शुन्य पर आउट नहीं हुआ।
क्रिकेट में आकंडे बेहद मायने रखते हैं। अगर ये कहा जाए क्रिकेट आंकड़ों का ही खेल है तो यह गलत नहीं होगा। किस बल्लेबाज ने कितने शतक-अर्धशतक बनाए, किस गेंदबाज ने कितने विकेट लिए, कौन कितनी बार शुन्य पर आउट हुआ, ये सब गणनाएं क्रिकेट की किताब में एक रिकॉर्ड की तरह दर्ज हो जाती हैं।
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शुन्य पर आउट होना किसी बल्लेबाज को गवारा नहीं होता है, लेकिन कभी-कभार बल्लेबाज सामने वाले गेंदबाज का शिकार हो ही जाता है। लेकिन क्या आपको पता है कि भारतीय क्रिकेट टीम के इतिहास में एक खिलाड़ी ऐसा भी रहा जो शुन्य पर कभी आउट नहीं हुआ।
यहां हम बात कर रहे हैं मध्यक्रम के बल्लेबाज यशपाल शर्मा की। 1983 में वर्ल्ड कप विजेता भारतीय टीम के सदस्य रहे यशपाल को वनडे में सात साल तक कोई भी गेंदबाज शून्य पर आउट नहीं कर सका।
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11 अगस्त 1954 को लुधियाना में जन्में इस खिलाड़ी ने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच 1978 में पाकिस्तान के खिलाफ खेला था।
यशपाल शर्मा ने भारत के लिए 42 एकदिवसीय मैच खेले। अपने करियर में उन्होंने चार अर्धशतक जड़े। वनडे में उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 89 रन रहा है। उनके टेस्ट करियर की बात करें तो उन्होंने 37 मैचों की 59 पारियों में दो शतक और 9 अर्धशतक के साथ 1606 रन बनाए हैं। टेस्ट में उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 140 है।
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यशपाल शर्मा भारतीय क्रिकेट के इतिहास का एक ऐसा नाम हैं जिन्होंने 1983 वर्ल्ड कप में एक संकट मोचन के किरदार को बड़े ही असाधारण सलिके से निभाया था और भारतीय टीम को कई मौकों पर जीत दिलाने में अपनी अहम भूमिका निभाई थी।
विराट कोहली ने किससे थप्पड़ खाए? बचपन में उनका फेवरेट शॉट क्या था? ट्रेनिंग के पहले दिन किस चीज को देख कोच हैरान रह गए थे? कामयाब होने के बाद उन्होंने अपने कोच को क्या गिफ्ट दिया? विराट कोहली के जबरा फैन लोग खुश हो जाएं. उनकी जिंदगी पर नई किताब आई थी , जिसमें ऐसे सैकड़ों सवालों के जवाब आपको मिले. नाम है, ‘ड्रिवेन: द विराट कोहली स्टोरी’. इसे लिखा है सीनियर खेल पत्रकार विजय लोकापल्ली ने और छापा है ‘ब्लूम्सबरी इंडिया’ ने. इस किताब एक हिस्सा आप पढ़ रहे हैं.
1. गुरु को गिफ्ट राजकुमार शर्मा के लिए ‘टीचर्स डे’ का मतलब था, अपने बच्चों अविरल और सुहानी से उनके स्कूली किस्से सुनना. लेकिन 2014 की उस सुबह ने इस दिन को यादगार बना दिया. शुक्रिया, उनके लाडले चेले का.
‘दरवाजे की घंटी बजी. मैंने खोला तो विकास (विराट का भाई) खड़ा था.’ राजकुमार जानते थे कि विराट एक फोटोशूट के लिए अमेरिका में है. इतनी सुबह-सुबह उसके भाई के आने से वो एकबारगी फिक्रमंद हो गए थे. विकास ने भी क्रिकेट के सपने देखे थे, लेकिन वो क्लब क्रिकेट से आगे नहीं जा सका. राजकुमार कहते हैं, ‘मैं दोनों भाइयों में फर्क नहीं करता, लेकिन सच यही है कि विराट कई मील आगे था.’
किताब का कवर पेज विकास घर में आया और अपने फोन से एक नंबर डायल किया. ‘हैपी टीचर्स डे सर.’ उधर से विराट की आवाज थी. ठीक इसी वक्त विकास ने राजकुमार की मुट्ठी में कुछ फंसा दिया. ये चाभियों का एक गुच्छा था. राजकुमार हैरान थे. विकास ने उनसे घर के बाहर चलने को कहा. वहां एक चमकती हुई स्कोडा रैपिड कार खड़ी हुई थी. ये विराट कोहली का अपने गुरु को गिफ्ट था.
राजकुमार कहते हैं, ‘गिफ्ट बहुत अच्छा था, लेकिन मैं उसके स्टाइल और तरीके पर बिछ गया. उसकी भावुकता देखिए. विराट की विनम्रता और बड़ों के लिए सम्मान से मैं आश्वस्त हो गया. इसलिए नहीं कि उसने मुझे कार गिफ्ट की. इस पूरे प्रोसेस में उसका इमोशनल टच था, ये याद दिलाने के लिए कि उसने हमारे रिश्ते को कैसे संजोया है और जिंदगी में टीचर के रोल की कद्र की है.’
2. कोचिंग का पहला दिन राजकुमार के मुताबिक, ‘छुटपन में कोचिंग के समय विराट चोरी से सीनियर्स के ग्रुप में घुस जाता था. मैं हर बार उसे डांटता था. मैं उसके लिए तब से फिक्रमंद हूं, जब वो 10 साल का भी नहीं था. लेकिन उसके पास हिम्मत और विलपावर थी, अपने से बड़े प्लेयर्स के साथ खेलने की.’ पहले दिन बाउंड्री के पास से उसका तेजतर्रार थ्रो, सीधा विकेटकीपर के दस्तानों में गया. 9 साल के इस बच्चे के बाजुओं की ताकत देख राजकुमार हैरान रह गए.
राजकुमार शर्मा के साथ विराट. राजकुमार बताते हैं कि विराट हमेशा अपने से ज्यादा उम्र के खिलाड़ियों के साथ खेलना चाहता था. वो कहता था, ‘मैं उनसे बेटर कर सकता हूं.’ ऐसा उसने करके भी दिखाया. वो खेल के हर फील्ड में घुसना चाहता था. उसे इस सबसे दूर रखना मुश्किल था. वो बैटिंग, बोलिंग और सारी पोजीशन पर फील्डिंग करना चाहता था. मुझ पर विराट को प्रमोट करने के आरोप भी लगे, लेकिन यकीन करिए मुझे आराम से बैठकर बस उसे प्रोग्रेस करते और लोगों को गलत साबित करते हुए देखना था.
3. ‘सर, सीनियर्स के साथ खेलना है, ये बच्चे मुझे आउट नहीं कर पाते’ राजकुमार को बखूबी याद है. वेस्ट दिल्ली क्रिकेट एकेडमी में एडमिशन का पहला दिन था. सैकड़ों बच्चों आए थे. उनमें 9 साल का ये गोलू-मोलू भी अपने पापा का हाथ थामे पहुंचा था. राजकुमार ने बच्चों को दो ग्रुप में बांटा- सीनियर और जूनियर. विराट सिर्फ 9 साल का था.
वो उदासीन कदमों से सीनियर्स की तरफ बढ़ा और उनसे एक-एक करके ‘हेलो’ करने लगा. राजकुमार ने चिल्लाकर कहा, ‘वहां जाओ’ और उसे जूनियर ग्रुप में भेज दिया. पहले दिन से वो लड़का सीनियर्स के साथ ट्रेनिंग लेना चाहता था.
फिर एक दिन विराट एक शिकायत के साथ राजकुमार के पास पहुंचा. ‘मैं सीनियर्स के साथ खेलना चाहता हूं. जूनियर लड़के मुझे आउट नहीं कर पाते.’ राजकुमार ने उसके पैड बंधवाए और सीनियर्स के साथ खिलाने ले गए. वो कहते हैं, ‘वो एक बार भी आउट ऑफ प्लेस नहीं लगा.’
राजकुमार भी अपने दिनों में इतने ही कंपटीटिव थे. वो ऑफ स्पिन फेंकते थे और हमेशा सेट हो चुके बल्लेबाज को आउट करने में आनंद लेते थे.
जब मुथैया मुरलीधर अपने पहले सीजन में थे, राजकुमार दिल्ली में अपना करियर खत्म कर रहे थे. दोनों की अब तक मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन वो राजकुमार को ‘दूसरा’ फेंकते देखते तो जरूर रश्क करते. राजकुमार हंसते हुए कहते हैं, ‘लेकिन मेरी कोहनी 15 डिग्री से ज्यादा नहीं मुड़ती थी.’ राजकुमार मदनलाल की कप्तानी वाली उस दिल्ली टीम में शामिल थे जिसने 1989 में रणजी ट्रॉफी जीती थी.
4. ग़लतियों पर पड़ते थे झन्नाटेदार झापड़ राजकुमार बताते हैं कि विराट को उसकी सीट पर बैठाए रखना बहुत मुश्किल था. अगर दूसरी टीम कम स्कोर पर आउट हो जाती तो वो पहले बैटिंग करने जाना चाहता था. वो कोच से बड़ी मासूमियत से कहता था, ‘मुझे बैटिंग नहीं मिली तो?’ विराट शुरू से नंबर 4 पर बैटिंग करने उतरता था, लेकिन आप उससे कभी भी ओपनिंग करवा सकते थे. आउट होने के बाद भी वो अपने पैड नहीं उतारना चाहता था.
लेकिन विराट जब गलती करता था तो राजकुमार कोई नरमी नहीं बरतते थे. वो बताते हैं, ‘मैं उसे सिर्फ डांटकर ही नहीं रुक जाता था. कई बार झन्नाटेदार थप्पड़ कारगर साबित हुए.’
5. अपने फेवरेट शॉट को लेकर वो ज़िद्दी था राजकुमार बताते हैं कि फ्लिक विराट का सबसे प्रोडक्टिव शॉट था. वो बड़े आराम से बॉल पिक करता था और बल्ले के सबसे मजबूत हिस्से से छुआकर बॉल को बाउंड्री पर भेज देता था. लेकिन हर बार राजकुमार उसका ये शॉट पसंद नहीं करते थे, ‘ईमानदारी से मुझे विराट का फ्लिक पसंद नहीं था. जब आप अक्रॉस द लाइन फ्लिक करते हैं तो हमेशा रिस्क रहता है. मैं कई बार डांटता था उसे. मैं चाहता था कि वो मि़ड-ऑन पर शॉट खेले और मिडल स्टंप से बॉल न पिक करे. उसने मेहनत की और इस शॉट का मास्टर हो गया.’
अंडर-15 में विराट के टीममेट रहे रूशिल बताते हैं कि विराट अपने फ्लिक शॉट में गर्व महसूस करता था. एक बार हमें एक फॉर्म में अपने फेवरेट शॉट लिखकर बताने थे. राजकुमार सर हमेशा सीधे बल्ले से खेले जाने वाले शॉट्स पर ज़ोर देते थे. लेकिन विराट ने अपना फेवरेट शॉट ‘फ्लिक’ ही लिखा और मुझे भी यही लिखने को कहा. हमारे फॉर्म देखने के बाद राजकुमार सर के होठों पर जो स्माइल थी, मुझे आज तक याद है.
6. कोच ने उसे दो शॉट नहीं सिखाए, जान-बूझकर लेकिन राजकुमार विराट की ‘कवर ड्राइव’ को उसकी ताकत मानते हैं. वो बताते हैं कि विराट को कवर ड्राइव बहुत पसंद थी और वो ये शॉट इतना ज्यादा खेलने लगा था कि विकेट खो देता था. मैंने उसे मना किया. फिर उसको छक्कों की सनक हो गई. फिर वो हवा में शॉट खेलकर आउट होने लगा.
”एक बार मैंने उसे बहुत जोर से डांटा. ये सब तब हुआ, जब वो इंडिया के लिए खेलने लगा था. मैंने उससे कहा कि तू तब तक छक्का ट्राई नहीं करेगा, जब तक फिफ्टी न लगा ले. मैं उसे स्वीप और कट के लिए भी मना करता था. चाहता था कि वो बॉल को करीब से खेले. मैंने उसे ये दोनों शॉट सिखाए ही नहीं, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि वो इन रिस्की शॉट्स में उलझे, जबकि उसके तरकश में कहीं ज्यादा ताकतवर शॉट हैं. मैं बस उसका शॉट-सेलेक्शन दुरुस्त रखना चाहता था. अब वो हर तरह के शॉट में माहिर है.”
अब भी जब चीजें बिगड़ती हैं तो विराट राजकुमार के पास ही जाते हैं. राजकुमार के मुताबिक, ‘मैं उसे जमीन पर रखता हूं, ये याद दिलाते हुए कि आगे लंबा सफर है. रिकॉर्ड तोड़ने से किसी क्रिकेटर को नहीं आंकना चाहिए. उसे कॉन्फिडेंट होना चाहिए, लेकिन ओवर-कॉन्फिडेंट नहीं. अब वो कैप्टन है और मैं उसे कहता हूं कि जो काम वो आसानी से कर सकता है, उसे दूसरों से एक्सपेक्ट न करे. गेम के लिए उसकी सोच और अप्रोच बाकी लोगों से अलग है.’
राजकुमार शर्मा
बिलाशक! विराट का सरापा उस थान के कपड़े से नहीं बना है, जो बाकी खिलाड़ी पहनकर मैदान पर उतरते हैं. आप बधाई दीजिए, 2016 को द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता उनके गुरु राजकुमार शर्मा को!
उनके थप्पड़ न होते तो उस लड़के का वैभव विराट न होता.
Pakistani man, 50, is addicted to eating TREES FOR 25 YEARS
पाकिस्तान में एक व्यक्ति 25 साल से पत्ते और लकड़ियां खाकर जिंदा है। खास बात ये है कि अपनी इस आदत की वजह से वह कभी बीमार भी नहीं पड़ा।
पंजाब प्रांत के गुजरांवाला जिले के रहने वाले 50 वर्षीय महमूद बट्ट ने बेरोजगारी की वजह से खाना नहीं जुटा पाने के कारण 25 वर्ष की उम्र से पत्तियां खाना शुरू किया था।
गरीबी ने बना दिया ऐसा
बट्ट ने बताया कि उसका परिवार बहुत गरीब था। बट्ट ने कहा, मैंने तय किया कि गलियों में भीख मांगने से अच्छा है कि लकड़ियां और पत्ते खाऊं। पत्ते और लकड़ियां खाना अब मेरी आदत बन गई है।
बरगद के पत्तों को चाव से खाते हैं
बट्ट ने बताया कि उन्हें बरगद के पेड़ के पत्ते खाना बहुत पसंद है। कुछ वर्षों के बाद जब बट्ट को काम मिला और वह भोजन जुटाने लायक हो गए तब भी उनसे ये आदत नहीं छूटी।
गधा गाड़ी ढोकर चलाते हैं घर
बट्ट आज अपनी गधा गाड़ी पर सामान ढोकर रोजाना 600 रुपये कमा लेते हैं। बट्ट के पड़ोसी गुलाम मोहम्मद ने कहा कि बट्ट कभी डॉक्टर के पास नहीं गया है। खाने की इस आदत की वजह बट्ट अपने इलाके में बहुत चर्चित है। उसके पड़ोसी ने बताया कि अक्सर रास्ते में अपनी गधा गाड़ी रोक कर बट्ट को पेड़ों से ताजा पत्ते तोड़ कर खाते हुए देखा जा सकता है।
किसी तथाकथित ‘ऊंची’ जाति के हिंदू परिवार में पैदा होना, जिसके पास खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने की सुविधा हो, ये अपने आप में एक प्रिविलेज है. इस बात को बताना नहीं पड़ेगा कि आप शिक्षित हैं, स्कूल से लेकर कॉलेज तक अच्छा करते आए हैं. अच्छा नहीं तो कम से कम औसत. नौकरी पा चुके हैं. काबिलियत नहीं तो कम से कम इतना तो आपके पिताजी का रुतबा है ही कि कहीं आप सिफारिश लगवा सकें.
फिर भी आप अक्सर परेशान हो जाते हैं. जीवन का मतलब खोजने लगते हैं. लगता है लाइफ में अच्छा नहीं कर रहे तो और पाना चाहते हैं. घर में काम भर के बर्तन हों तो सोफ़ा चाहते हैं. सोफा हो तो टीवी, टीवी हो तो गाड़ी. आपको ये नहीं सोचना पड़ता कि अगली खुराक में क्या खाएंगे.
आपका अगर पूरा बैंक अकाउंट खाली भी हो जाता है, तो उधार मिल जाता है. कितने भी बुरे दिन आ जाएं, कभी आपकी इज्ज़त नहीं जाती. दोस्त कभी ये नहीं कहते कि मेरे घर में सोफे पर क्यों बैठे हो, जमीन पर बैठो.
क्योंकि आप ऊंची जात के हैं. आप भले ही किसी झाड़ू-पोंछा करने वाले दलित से गरीब हो जाएं, लोग आपका अपमान नहीं करेंगे. ये आप की जाति का असर है. आपने इसे चुना नहीं है, पाया है. इसी तरह अगर आप दलित हैं, तो भी आपने उसे चुना नहीं, पाया है.
Members of the Dalit community stick slogans on their chests during an International Human Rights rally in Kathmandu December 10, 2009. The signs read, “Where are the human rights of untouchables?”, “One-fourth of the country’s untouchables are ignored, do not lie to the world” and “Implement universal human rights or else declare the country untouchable” (L-R). The people known as the Dalits are traditionally regarded as the lowest caste in the Hindu social community. REUTERS/Navesh Chitrakar
फर्क सिर्फ इतना है कि ऊंची जाति वालों को विरासत में सम्मान मिलता है और नीची जाति वालों को अपमान.
हम अक्सर कहते हैं कि अब जातिवाद कहां रह गया है. हम कहते हैं कि शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में हर तरह के लोग एक दूसरे के साथ ट्रेवल कर रहे होते हैं. कोई किसी की जाति पूछता है क्या. हम अक्सर ये भी कहते हैं कि आरक्षण की क्या जरूरत है. कि आरक्षण से केवल कुछ जातियों को वो फायदा मिलता है जिसके वो हक़दार नहीं हैं, कुछ लोग ये भी कहते हैं कि अगर आरक्षण न होता, मेरा सिलेक्शन हो गया होता.
जब हम कहते हैं कि अब लोग खुली सोच के हैं, दलितों से भेदभाव नहीं होता, हम शायद अपने गांवों, घरों को भूल जाते हैं. जहां आज भी बाथरूम साफ़ करने वालों को पैसे हाथ में नहीं पकड़ाए जाते. अलग रख दिए जाते हैं, जिसके आपकी गैरमौजूदगी में वो उसे खुद उठा लें. जहां नौकरों के कप और बर्तन अलग कर दिए जाते हैं. जहां मजदूरों के लिए चाय तो बनती है, मगर उन्हें दी डिस्पोजेबल कप में जाती है.
फिर आप ये कहते हैं कि वो लोग गंदे होते हैं न. असल में हमारे जिस मल-मूत्र को वो साफ़ कर रहे होते हैं, वो हमारे ही शरीर से निकला होता है. जब हमारे बच्चे कपड़ों में टट्टी कर देते हैं, हम उन्हें गंदा कहकर उनसे दूर नहीं भागते. मगर मल साफ़ करने वालों के प्रति हमारे अंदर एक अजीब सी घिन भरी होती है. वही मल, जो हम उन्हें देते हैं, जो हमारे घरों की नालियों से उन तक पहुंचता है.
कभी मल साफ़ करने वालों के जीवन का एक मिनट भी जिया है?
एक लड़के ने ऐसा किया. सीवर के पानी में उतर गया. सीवर साफ़ करने वालों से बात की.
ये समदीश भाटिया हैं. इन्होंने ‘चेज’ के लिए एक डाक्यूमेंट्री बनाई है. डाक्यूमेंट्री का नाम है ‘डीप शिट’. अंग्रेजी में ये दो शब्द हम अक्सर यूज करते हैं. कभी किसी मुसीबत में होते हैं, कहते हैं, ‘आई एम इन डीप शिट.’ शिट मतलब मल या गंदगी. इस अंग्रेजी वाक्य में ‘शिट’ किसी की मुश्किलों का रूपक है. मगर ये डाक्यूमेंट्री देखकर आप जानेंगे कि असल में ‘डीप शिट’ यानी मल के दलदल में धंसे होने का क्या मतलब होता है.
‘हम इसे संडास नहीं बोलते. संडास बोलने में बुरा लगता है. इसे हम देसी घी के परांठे बोलते हैं.’
‘मैं ये काम नहीं करूंगा तो मालूम बम्बई का क्या होइंगा? लाखों, करोड़ों लोग बीमार पड़ेगा.’
-राजू, 54, सीवेज वर्कर
ये काम किसे पसंद आता है, मगर करना पड़ता है… गर्लफ्रेंड को नहीं पता ये काम करता हूं. बताने में शर्म आती है.
-सुमित, 19, सीवेज वर्कर
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‘रोज रात को दारू पीता हूं, ताकि दिनभर जो देखता हूं उसे भूल जाऊं.’
-राजू, 54, सीवेज वर्कर
‘हम हाईवे बनाना चाहते हैं तो बन जाते हैं न? सिक्स लेन, एट लेन, बारह लेन रोड बना लेते हैं. उसका पैसा होता है. नालियां बनाने का पैसा नहीं होता क्या? इसका एक ही मतलब है. आप बनाना ही नहीं चाहते.’
-बेजवाडा विल्सन, फाउंडर, सफाई कर्मचारी आंदोलन
‘हर दलित सफाई कर्मचारी नहीं है. लेकिन हर सफाई कर्मचारी दलित है. हमारी पिछली तीन पीढियां सफाई कर्मचारी रही हैं. पिताजी हर शाम काम करने बाद जब घर आते, शराब पिए होते थे. मां को पीट देते थे. मगर उनको पूरा दोष नहीं देता. दिन भर गंदगी में काम करते थे. स्ट्रेस में आकर गुस्सा कहां निकालेंगे?’
-सुनील, पीएचडी स्टूडेंट और सफाई कर्मचारी
‘मेरे पिता सीवर साफ़ करने घुसे. उसके अंदर की गैस की वजह से मर गए.’
-सुमीत, बेटा
Source: Chase
‘भगवान की मिट्टी से बना हूं. भगवान ने ये काम दिया है मुझे.’