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shraadh 

पुरखों को श्रद्धा से याद किया जाने वाला पितृ पक्ष छत्तीसगढ़ में 'पितर पाख' नाम से जाना जाता है। पितर पाख 5 सितंबर से शुरू होकर 19 सितंबर सर्व पितृमोक्ष अमावस्या तक मनाया जाएगा। जिस तिथि को पूर्वजों की मृत्यु हुई है, उसी तिथि को नदी-तालाबों में स्नान करके पितरों को जल अर्पित करके उनके नाम पर ब्राह्मणों को भोज करने की परंपरा निभाई जाएगी।


पहले दिन पितर बैसकी की परंपरा निभाएंगे

महामाया मंदिर के पुजारी पं.मनोज शुक्ला के अनुसार पितर पाख के पहले दिन को पितर बैसकी कहा जाता है। पितर हिन्दी तथा बैसकी छत्तीसगढ़ी शब्द है। इसका तात्पर्य पितर को बिठाना होता है। छत्तीसगढ़ की प्रचलित परंपरानुसार घर की बहुएं सुबह सबसे पहले घर की देहरी (दहलीज) व दरवाजे को गोबर से लीपती हैं, जिसे ओरी लीपना कहते हैं। उसके बाद चाँवल के आंटे से सुंदर चौक (रंगोली) पूरकर बीच मे पीढ़ा रखती हैं।


पीढ़ा के दोनों ओर के चौक में कुम्हड़ा, रखिया व दुधमोंगरा के फूल को सजाती हैं। इसके बाद फूलों से सजे सुसज्जिात पीढ़ पर एक लोटा में पानी, दातून व कुशा रखा जाता है। फिर श्रद्घापूर्वक पितरों के निमित्त धूप (गाय के गोबर से बने कंडे को जलाकर चावल, गाय का घी व देसी गुड़) देते हैं। इस तरह से पितर पाख के पहले दिन ही पितर देवताओं को नेवता देकर स्वागत किया जाता है।



सात पीढ़ियों के निमित्त भोजन

पं.शुक्ला बताते हैं कि घर का मुखिया सात पीढ़ी के पितरों के निमित्त तरोई के सात पत्तों में पूड़ी, बड़ा आदि भोज्य पदार्थो को पितर देवताओं को भोग लगाते हैं। फिर घर के मुंडेर पर कौओं के लिए तथा गौ माता, कुत्ते के लिए भी भोजन निकाला जाता है। यथाशक्ति ब्राह्मणो को भोजन कराकर पितरो के पसंद की सामग्री,वस्त्र आदि दान किया जाता है।



पितर पक्ष की खास तिथियां

# पिता का श्राद्घ अष्टमी और और माता का नवमी को।

# जिन परिजनों की मृत्यु दुर्घटना या आत्महत्या से उनका श्राद्ध चतुर्दशी को।

# साधु और संन्यासियों का श्राद्घ द्वाद्वशी को।

# जिनकी मृत्यु तिथि पता नहीं उनका श्राद्ध अमावस्या कों


तारीख श्राद्ध तिथियां

5 पूर्णिमा

6 प्रतिपदा

7 द्वितीया

8 तृतीया

9 चतुर्थी

10 पंचमी

11 षष्ठी

12 सप्तमी

13 अष्टमी

14 नवमी

15 दशमी

16 एकादशी

17 द्वादशी/ त्रयोदशी

18 चतुर्दशी

19 सर्व पितृ अमावस्याश्राद




सोर्स:नयी दुनिया
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 Janmashtami 2017


भारत सहित पूरे विश्व में हिंदू संप्रदाय के लोग कृष्ण जन्माष्टमी इस बार 14 अगस्त मनाएंगे। भगवान श्री कृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में यह त्योहार मनाया जाता है। 


पुराणों के मुताबिक भगवान श्री कृष्ण ने भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अवतार लिया था। इसके बाद से इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। इस त्योहार को भारत में हीं नहीं बल्कि विदेश में भी हिंदू संप्रदाय के लोग पूरी आस्था के साथ मनाते हैं।


Happy Janmashtami  


बताया जाता है कि भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात में अत्याचारी मामा कंस के विनाश के लिए भगवान श्री कृष्ण ने मथुरा में अवतार लिया था। इसलिए इस दिन मथुरा में काफी हर्षोउल्लास से जन्माष्टमी मनाई जाती है। दूर-दूर से लोग इस दिन मथुरा आते हैं।



 इस दिन मथुरा नगरी पूरे धार्मिक रंग में रंगी होती है। इस दिन भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है और झांकियां सजाई जाती हैं। इसके अलावा मंदिरों में रासलीला का आयोजन भी किया जाता है। नीचे दिए गए वीडियो के मुताबिक 5 हजार 243 वर्ष पूर्व भगवान श्री कृष्ण मध्य रात्रि में इस धरती पर अवतरित हुए थे।



जन्माष्टमी के दिन व्रत रखने का भी विधान है। इस दिन व्रत रखने का हिंदू धर्म में काफी महत्व बताया गया है। बताया जाता है कि इस दिन व्रत रखने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। 



स्कंद पुराण के मुताबिक जो मनुष्य जानते हुए भी इस दिन व्रत नहीं रखता, वह जंगल में सृप होता है। लेकिन जो व्यक्ति विधि के अनुसार और पूरी आस्था के साथ इस दिन व्रत रखते हैं, उनके पास हमेशा लक्ष्मी स्थिर रहती है और बिगड़ते काम बन जाते हैं।



क्या है व्रत विधि- व्रत की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करना चाहिए और इस दिन शारीरिक संबंध भी नहीं बनाने चाहिए। व्रत के दिन सुबह स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद जल, फल, कुश लेकर व्रत का संकल्प करें। संकल्प करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें और पूजन करें। पूजा में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंदू, यशोदा, लक्ष्मी का नाम लेना ना भूलें।




सोर्स:जनसत्ता
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 14 Year Mumbai Boy Commit Suicide To Complete The Online Game Blue Whale Challenge

क्या कोई इंटरनेट गेम किसी की जान ले सकता है? अभी तक तो लगता था कि ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन जब से ब्लू वेल (Blue Whale) नाम का गेम आया है, इसने दुनियाभर में 250 से ज्यादा लोगों की जान ले ली है. इनमें अकेले रूस में 130 से ज्यादा मौतें हुई हैं. इसके अलावा पाकिस्तान और अमेरिका समेत 19 देशों में इस गेम की वजह से खुदकुशी के कई मामले सामने आए हैं.


अब इन जान गंवाने वाले लोगों की लिस्ट में अपने देश का भी नाम शामिल हो गया है. 30 जुलाई को मुंबई में जिस 14 साल के लड़के ने सातवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी थी, बताया जा रहा है कि वो ब्लू वेल गेम खेल रहा था. इस गेम की आखिरी स्टेज में प्लेयर को खुदकुशी करने के लिए कहा जाता है और उस लड़के ने खुदकुशी कर ली. इंडिया में अभी इस तरह का कोई और मामला नहीं आया है.


पायलट बनना चाहता था, गेम खेलने में जान गंवा दी

14 Year Mumbai Boy Commit Suicide To Complete The Online Game Blue Whale Challenge
14 साल के बच्चे ने सातवीं मंजिल से छलांग लगाकर जान दे दी.

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक अंधेरी ईस्ट का रहने वाला मनप्रीत साहस 9वीं क्लास में पढ़ता था. शनिवार को उसने सातवीं मंजिल से कूदकर जान दे दी. घर में वो अपने मम्मी-पापा और दो बड़ी बहनों के साथ रहता था. उसका सपना पायलट बनने का था और ट्रेनिंग के लिए रूस जाना चाहता था. जिस ब्लू वेल गेम को खेलते हुए उसने जान गंवाई, वो रूस में ही बनाया गया है.


इंटरनेट पर खोजा था छत से कूदने का तरीका

सुसाइड केस की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि मनप्रीत ने छलांग लगाने से पहले इंटरनेट पर सर्च किया था कि छत से छलांग कैसे लगाई जाती है. मनप्रीत ने शुक्रवार को ही दोस्तों को बता दिया था कि वो सोमवार को स्कूल नहीं आएगा. 


शनिवार को छलांग लगाने से पहले मनप्रीत ने करीब 20 मिनट तक घर की छत पर बैठकर अपने दोस्तों से बात की. मनप्रीत ने गेम के आखिरी टास्क को लेकर छत से छलांग लगाने का भी जिक्र किया. उसने चैटिंग में लिखा कि अब आप लोग मुझे सिर्फ तस्वीरों में ही देखोगे, लेकिन किसी ने उसकी बात को गंभीरता से नहीं लिया. बाद में पता चला कि उसने खुदकुशी कर ली.


पड़ोसी ने कहा था, ‘नीचे उतरो’

जांच टीम में शामिल एक अफसर के मुताबिक मनप्रीत जब छलांग लगाने के लिए टेरेस पर गया था, तो दूसरी बिल्डिंग के एक शख्स ने उसे देख लिया था. उसने मनप्रीत से नीचे उतरने के लिए भी कहा था. पुलिस अधिकारी के मुताबिक मनप्रीत ने इस बात का जिक्र गेम के एडमिन से भी किया था, लेकिन एडमिन उसे आत्महत्या करने के लिए उकसाने में सफल रहा.


50 स्टेज में पूरा होता है गेम

द ब्लू वेल गेम को 2013 में रूस से फिलिप बुडेकिन ने बनाया था. इस खेल में एक एडमिन होता है, जो खेलने वाले को अगले 50 दिन तक बताते रहता है कि उसे आगे क्या करना है. अंतिम दिन खेलने वाले को खुदकुशी करनी होती है और उससे पहले एक सेल्फी लेकर अपलोड करनी होती है.
अजीबो-गरीब होते हैं टास्क


blue whale challenge
आत्महत्या के लिए छत से कूदने के लिए कहा जाता है.

 
गेम खेलने वाले को हर दिन एक कोड नंबर दिया जाता है, जो हॉरर से जुड़ा होता है. इसमें हाथ पर ब्लेड से F57 लिखकर इसकी फोटो अपलोड करने के लिए कहा जाता है. इसके अलावा हर रोज के खेल के लिए एक कोड होता है, जो सुबह चार बजे ही ओपन हो सकता है. 


इस गेम का एडमिन स्काइप के जरिए गेम खेलने वाले से बात करता रहता है. हर टास्क के पूरा होने पर हाथ में एक कट लगाने के लिए कहा जाता है और उसकी फोटो अपलोड करने को कहा जाता है. गेम का विनर उसे ही घोषित किया जाता है, जो अंतिम दिन जान दे देता है.


गेम छोड़ने पर मिलती है धमकी

अगर किसी ने एक बार गेम खेलना शुरू कर दिया, तो वो इसे बीच में नहीं छोड़ सकता. एक बार गेम शुरू हो जाने पर गेम खेलने वाले का फोन एडमिन हैक कर लेता है और फोन की सारी डिटेल उसके कब्जे में आ जाती है. अगर कोई बीच में गेम छोड़ना चाहे, तो एडमिन की तरफ से धमकी मिलती रहती है कि उसे या फिर उसके माता-पिता को जान से मार दिया जाएगा.


जेल में है गेम बनाने वाला

यह गेम 2013 में रूस में बना था, लेकिन सुसाइड का पहला मामला 2015 में आया था. इसके बाद गेम बनाने वाले फिलिप को जेल भेज दिया गया. जेल जाने के दौरान अपनी सफाई में फिलिप ने कहा था कि ये गेम समाज की सफाई के लिए है. जिन लोगों ने भी गेम की वजह से आत्महत्या की, वो बॉयोलॉजिकल वेस्ट थे.


ब्रिटेन में लॉन्च होने वाला है गेम

250 से अधिक मौतों के बाद भी इस गेम को दुनिया के किसी भी देश में बैन नहीं किया गया है. ये अभी तक ब्रिटेन में लॉन्च नहीं हुआ है, लेकिन अब वहां भी इसे लॉन्च करने की तैयारी चल रही है. ब्रिटिश वेबसाइट metro.co.uk के मुताबिक बेसिलडोन के वुडलैंड्स स्कूल के प्रिंसिपल डेविड राइट ने बच्चों के माता-पिता को आगाह करते हुए एक पत्र लिखा है. उन्होंने लिखा कि पुलिस की मदद से उन्होंने एक गेम का पता लगाया है, जिससे लोगों को सावधान रहने की जरूरत है. यह ब्लू वेल नाम का गेम है, जो कई सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर खेला जाता है. इसमें खेलने वाले को आखिरी दिन जान देकर गेम जीतना होता है.


पोकेमॉन गो ने भी मचाया था हंगामा


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2016 में पोकेमॉन गो बच्चों के साथ बड़ों में भी पॉपुलर हुआ था

पिछले साल गेम्स की दुनिया में पोकेमॉन गो ने हंगामा मचाया था. ये जानलेवा भले नहीं था, लेकिन बहुत सारे लोग काम-धाम छोड़कर पोकेमॉन पकड़ने के लिए निकल जाते थे. हालांकि, कुछ महीनों बाद इसके क्रेज में कमी आ गई है. भारत में अब भी ये गेम आधिकारिक तौर पर लॉन्च नहीं हुआ है.




सोर्स:लल्लनटॉप.कॉम
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भाई-बहन के प्रेम का त्यौहार माना जाना वाला पर्व रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाएगा। यह तिथि आगामी सात अगस्त को पड़ रही है। लेकिन भारतीय काल गणना के अनुसार इस बार भाई-बहन के लिए यह पर्व मनाने का शुभ मुहूर्त काफी कम समय का है। इसका एक कारण इस श्रावण पूर्णिमा के दिन चंद्रग्रहण पड़ना भी है। 


बता दें कि सोमवार 10 जुलाई से श्रावण (सावन) मास आरंभ हो रहा है। यह मास विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि सावन के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव की पूजा विशेष फलदायी है। इस बार सावन में पांच सोमवार भी पड़ रहे हैं। वहीं सावन के आखिरी सोमवार 7 अगस्त को रक्षाबंधन है। 



लेकिन इसी दिन चंद्र ग्रहण भी पड़ेगा। ऐसे में भद्रा और सूतकों के चलते राखी बांधने के लिये बहिनों को केवल दो घंटे 45 मिनट का समय ही शुभ रहेगा। मथुरा के ज्योतिषाचार्य पंडित कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने बताया 6 अगस्त रविवार की रात्रि 10 बजकर 29 मिनट से भद्रा लग जायेंगी। जो 7 अगस्त रक्षाबंधन के दिन सुबह 11 बजकर 7 मिनट तक रहेंगी। 



वहीं इसी दिन दोपहर के 1 बजकर 52 मिनट से सूतक लग जाएंगे। ऐसे में बहिनों को इसी समयावधि दो घंटा 45 मिनट ही राखी बांधने के लिए शुभ रहेगा। इस दिन रात्रि में 10 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 48 मिनट तक पूरे भारत में चंद्रग्रहण दिखेगा। 




सोर्स:अमरउजाला
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fathers day quotes

हम्म, तो क्या लिया आपने अपने पापा के लिए फादर्स डे के मौके पर... यकीनन अभी तक तो काफी कुछ प्लान कर चुके होंगे आप. अगर प्लान नहीं भी किया तो कोई बात नहीं. आप उनके लिए ले सकते हैं कुछ कार्ड या उनसे शेयर कर सकते हैं कुछ मैसेज जो उनके लिए आपकी भावनाओं को बयां कर सकें. क्या कहते हैं आप... अब आप सोच रहे होंगे कि इतने कम समय में आप मैसेज या कार्ड कहां से तलाशेंगे. तो इसमें आपकी मदद करेंगे हम. हम आपसे शेयर कर रहे हैं फादर्स डे पर स्पेशल कुछ मैसेज..



"अपने पिता के बिना, मैं यहां नहीं हो सकती थी." - मारिया शारापोवा



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''एक इंसान जो दूसरे को सबसे महान तोहफा दे सकता है, वह मेरे पिता ने मुझे दिया, उन्होंने मुझ पर विश्वास जताया'' - जिम वाल्वानो



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''वह पिता एक बुद्धिमान पिता है जो अपने बच्चों को जानता है.'' - विलियम शेक्सपीयर



''मैं जीने के लिए तो अपने पिता का कर्जदार हूं.'' - एलेक्जेंडर महान



''मेरे पिताजी अपने पिताजी से डरते थे और मैं अपने पिताजी से डरता था पर मुझे यह नहीं समझ आता की मेरे बच्चे मुझसे क्यों न डरे.'' - लॉर्ड माउंटबेटन



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''पिताजी ने मुझे बताया था कि दुनिया में दो तरह के लोग रहते हैं. एक देने वाले और दूसरे लेने वाले. लेने वाले भले ही अच्छा खा ले लेकिन देने वाले अच्छी तरह सोते है.''- मार्लो थोमस



''वह व्यक्ति जो अपने पिताजी से बदला ले, वह कुछ भी कर सकता है.'' - पीयरे कोर्नेले



''मेरे पिता असफल नहीं थे. वे एक अमेरिकी राष्ट्रपति के पिता थे.'' - हैरी एस


 
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Superstition in India

दुनिया में Azab Gazab परम्पराएं हैं जिसे लोग बहुत समय से मानते आ रहे हैं. ऐसा हर धर्म और हर जगह के लोग करते हैं लेकिन सबसे ज्यादा अंधविश्वास India में फैला हुआ है. लोग वास्तु के हिसाब से घर और ऑफिस को सजाते हैं जिससे उनके सारे काम अच्छे हों लेकिन आज के Educated Society में ये पता होना चाहिए कि ये सब सिर्फ मन को शांत करने के टोटके हैं और कुछ नहीं.


India में ऐसे अंधविश्वास जिसे लोग रिवाज कहते हैं :

Superstition in India


अंधविश्वास की सबसे खास बात ये है कि वो किसी तर्क के नहीं होते फिर भी लोग इस पर आंख बंद करके विश्वास करते हैं. India में अंधविश्वास तो सदियों से चला आ रहा है जिसे उसकी पीढ़ी आज भी निभा रही है. आज हम आपको India के कुछ ऐसे अंधविश्वासों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका कोई मतलब नहीं बस इंसान अपनी गलत बातों को सही साबित करने के लिए लोगों से इसे मनवाते हैं. चलिए आप भी पढि़ए ये अंधविश्वास के तर्क और बताइए ये किस हद तक सही है.



1. काली बिल्ली का रास्ता काटती है :


Superstition in India



आपने अक्सर देखा होगा कि जब कोई किसी काम से जा रहा हो तो काले रंग की बिल्ली रास्ता काट जाती है और अपशगुन हो जाता है. तो लोग वापस धर आते हैं और कुछ देर बाद फिर निकलते हैं. India में ये अंधविश्वास सदियों से चला आ रहा है.



2. दुल्हन को दरवाजे पर रोक कर नजर उतारते है :


Superstition in India


India में जब किसी के घर नई दुल्हन आती है और तो घर की बड़ी महिला उसकी नजर उतारती फिर उसकी आरती उतारकर उसे घर में आने के लिए बोला जाता है. लोगों का मानना है कि ऐसा करने से बुरी दुल्हन के साथ आने वाली बुरी आत्मा वहीं रुक जाएगी.



3. कुत्ते-बिल्ली का रोना अपशगुन होता है :


Superstition in India



जब भी कुत्ते और बिल्ली रोते हैं तो लोग कहते हैं कहीं किसी की मरने की खबर आ सकती है जिसे लोग अशुभ मानते हैं. ऐसा सिर्फ India के लोग ही मानते हैं. लोग इसे आने वाली किसी अनहोनी का संकेत मानते हैं.



4. दिशाशूल और दिन सम्बंधी अंधविश्वास :


Superstition in India



ऐसा India में माना जाता है कि आपको जब यात्रा करनी हो तो दिन देख कर जाएं. इसके साथ ही बाल कटवाने, नाखुन काटने और नॉनवेज खाने की बात को दिनों से जोड़ा जाता है, जो कि ये भारत के सबसे प्रचलित अंधविश्वासों में से एक है.



5. छींक आने पर अशुभ होने के संकेत मिलते हैं :


Superstition in India


अगर आप घर से निकल रहे हैं और किसी ने छींक मार दी तो आप वहीं रुक जाते हैं. क्योंकि आपका शुभ काम रुक सकता है आपके मन में ये आ जाता है. छींक आने वाले को इस तरह घूरा जाता है जैसे उसने कोई जुर्म कर दिया हो. ऐसा लोगों का मानना है कि शुभ काम के समय छींक देने से उनको किसी बुरी खबर का सामना करना पड़ सकता है.



6. विधवाओं को शुभ कामों से दूर रखा जाता है :


Superstition in India

India में आज भी कई गांव और शहर में वे महिलाएं घर के शुभ काम नहीं कर सकती जिनके पति मर गए होते हैं. ये अवधारणा बहुत पुरानी है और लोग इसे आज भी मानते हैं. इस अंधविश्वास में, विधवा महिलाओं को अशुभ मानकर, उन्हें शादी और दूसरे शुभ कामों को नहीं करने दिया जाता है.

विधवाओं को सफेद रंग के अलावा किसी और रंग से कोई मतलब नहीं होना चाहिए. अगर किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है, तो उसका दंड महिला को क्यों मिलता है ? ऐसा समाज के ठेकेदार परम्परा मानकर इसका पालन करते है.



7. पीपल के पेड़ पर भूत होते हैं :

Superstition in India



हम सभी बचपन से सुनते आ रहे हैं कि पीपल के पेड़ पर चुड़ैल और भूत रहते हैं लेकिन क्या सच में ऐसा होता है या इसे अंधविश्वास मानना सही होगा ? दादी-नानी ने भूतों की बहुत सी कहानी सुनाई है और तब यकीन हो जाता था.

वे कहानी को ऐसे सुनाते थे जिसमें वे बताते हैं कि उन्होंने भूतों से लड़ाई की है. इसके पीछे सच्चाई ये होती है कि पीपल का पेड़ रात के समय कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी हानिकारक गैसों को छोड़ता है, जिसमें लोगों का दम घुटता है और लोग सोचते हैं कि इसपर भूत रहता है.



8. गंगा नहाओ और पाप मिटाओ :


Superstition in India


India के लोगों का विश्वास है कि गंगा में डुबकी लगाने से इंसान के सारे पाप धुल जाते हैं. इसलिए लोग अक्सर गंगा नहाने के लिए जाते हैं. लेकिन क्या सच में ये संभव है ? आप कुछ भी करें और गंगा जी में नहाकर पाप धुल जाएंगे, ये तो अंधविश्वास है. ऐसा करने से गंगा का पानी सिर्फ गंदा ही होता है क्योंकि लोग उसमें ब्रश से लेकर कपड़े तक धुलते हैं और इसमें नहाने वाले इंसानो की बढ़ती संख्या भी इसे दूषित बनाती है.



9. Periods में महिलाएं को मानते हैं अशुद्ध :


Superstition in India


India का ये सबसे बड़ा अंधविश्वास है जिसमें अगर कोई महिला Periods के दौर से गुजर रही है तो लोग उसे अशुद्ध मानने लगते हैं. ना किसी मंदिर के अंदर जा सकती है और ना घर के किचन में. ऐसा ज्यादातर गांवों की महिलाओं के साथ होता है.

जो गलत है, पीरिड्स में महिलाओं को समझना चाहिए क्योंकि उनके दर्द की कल्पना कोई पुरुष नहीं कर सकता ऐसे में महिलाओं को अशुद्ध मानना उनका अपमान करने के बराबर है. ऐसा रूढ़िवादी गांवो में महिलाएं और पुरुष दोनो उस महिला से करते हैं जो मासिक धर्म (Periods) से गुजर रही होती है.



10. घरों और दुकानों के दरवाजों पर लोग लटकाते हैं नींबू-मिर्च :


Superstition in India


India के ज्यादातर घरों और दुकानों में आपको नींबू-मिर्ची लटकती मिलेगी. अब आप इसे अंधविश्वास बोले या कुछ भी लेकिन ये प्रथा भी सदियों से चली आ रही है. लोगों का मानना है कि ऐसा करने से बुरी आत्मा और नजर घर या दुकान में नहीं आ सकती.



11. घर से निकलने पर मत टोको :


Superstition in India


India में जब बड़े घर के बाहर जाते हैं तो पीछे से कोई टोक देता है तो लोग बहुत बुरा मान जाते हैं और अगर वो घर के किसी बच्चे ने कर दिया तो बस बवाल है क्योंकि बड़ों के मुताबिक जब भी घर से बाहर जाते हैं तो टोका नहीं जाता.

अगर कोई अच्छे काम के लिए निकल रहा होता है और कोई पूछ ले कि कहां जा रहे हो तो उससे अच्छे काम नहीं होते हैं. ये टोकन बहुत पुरानी प्रथा है जिसे आज भी बहुत सारे लोग मानते हैं.




सौर:अज़ाब गज़ब 
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with bahubali 2 release hate mongers are back


 bahubali 2

‘बाहुबली-2’ रिलीज़ हो गई है. जैसा कि अंदाज़ा लगाया जा रहा था बंपर हिट साबित हो रही है. लगता है अगले-पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ के ही दम लेगी. एक रीजनल भाषा की फिल्म के लिए पूरे देशभर में ये दीवानगी अद्भुत है. 


बरसों बाद ऐसा नज़ारा देखने मिल रहा है. लेकिन इसी के साथ फिर से वही स्यापा शुरू हो गया है, जो पहली वाली ‘बाहुबली’ के वक़्त था. बल्कि इस बार नया आयाम भी जोड़ दिया है भाइयों ने.

 


‘कट्टपा ने बाहुबली को क्यों मारा?’ इस सवाल से पूरा भारत पिछले डेढ़-पौने दो सालों से जूझ रहा है. अब जब इसका जवाब मिलने की घड़ी आ गई है, तो कई सारे लोग सोशल मीडिया पर इसके इर्द-गिर्द खेल रहे हैं. कोई सस्पेंस खोलने की धमकी दे रहा है, तो कोई मज़ाक में अजीब-अजीब वजहें बता रहा है. लेकिन क्यूटता की हद तब हो गई जब कुछ मासूम लोग इस मज़ाक को साज़िश बताने लगे हैं. किसी षड्यंत्र की बू सूंघने लगे हैं.


कई जगह पढ़ा कि ‘बाहुबली-2’ का सस्पेंस लोग जानबूझकर लीक कर रहे हैं, ताकि फिल्म फ्लॉप हो जाए. इसे देखने कम लोग पहुंचे. ये एक साज़िश है ताकि किसी ‘हिंदू’ हीरो की फिल्म ख़ानों से ज़्यादा कमाई न कर पाए. हिंदू संस्कृति का प्रचार-प्रसार करती फिल्म को नुकसान हो. मैं हतप्रभ हूं. आती कहां से है इतनी मासूमियत! जनरेट कैसे होती है ये उलूकता?


bahubali 2



जब ‘बाहुबली-1’ आई थी तब भी ऐसी ही बातों से पूरा सोशल मीडिया पाट दिया था भाई लोगों ने. ‘बाहुबली’ वर्सेस ‘पीके’ का मैच करवा दिया था. एक जुमला आम हो गया था उस वक़्त. हिंदू धर्म का अपमान किए बगैर भी कोई फिल्म बनाई जा सकती है. 


करोड़ों रुपए कमा सकती है. ये सीधा पीके पर कटाक्ष था. ‘बाहुबली’ ने कंधे पर शिवलिंग नहीं उठाया था, बल्कि हिंदू संस्कृति को उठा लिया था. जो कि इतनी कमज़ोर थी कि उसे एक फिल्म के अलावा और कोई बचा ही नहीं सकता था.


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हिंदू संस्कृति की रक्षा महज़ इस सीन भर से हो गई.


ऐसा ही कुछ-कुछ ‘बजरंगी भाईजान’ के वक़्त भी हुआ था. कुछ मौलवियों ने गुहार लगाई थी कि बजरंगी बने भाईजान को नहीं देखें मुसलमान. वहीं कुछ सनातन प्रेम में सराबोर भाई लोग नारा बुलंद किए थे कि इस ईद पर जय हनुमान का नारा बुलंद करवाना हो तो फिल्म ज़रूर देखें. 



दोनों ही तरफ के लोग बिना कहानी जाने फतवे दे रहे थे. स्क्रीन शॉट नहीं लगा रहे हैं. फेसबुक, ट्विटर पर एक्टिव बंदों का ये सब देखा भाला होगा.
'पीके' के इस सीन से ही शिवजी की इज्ज़त कम हुई थी जिसे 'बाहुबली' ने अपना कंधा दे के फिर से प्रतिस्थापित किया.

 pk amir khan
बताया गया ‘पीके’ के इस सीन से ही शिवजी का अपमान हुआ था, जिसे ‘बाहुबली’ ने अपना कंधा दे के फिर से प्रतिस्थापित किया.



ऐसे वक़्त मैं तल्ख़ होने से बचना चाहता हूं, लेकिन कामयाब नहीं हो पाता. पिछले कुछ सालों से समूचे भारत में एक ट्रेंड सा चल पड़ा है. हर चीज़ को धर्म से जोड़ कर देखा जाने लगा है. फिल्मों के मामले में तो ये और भी बड़े लेवल पर होने लगा है. 



आमिर की फिल्म का बॉयकाट करो, शाहरुख़ की फिल्म मत देखो, बाहुबली के खिलाफ़ साजिश है ये सब बातें ऐसी हैं जिनसे चिढ़ उपजने लगी है. एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री जो कुछ भी आपको परोसती है उसका विशुद्ध मकसद कारोबार ही होता है. ‘बाहुबली’ हो या ‘पीके’, किसी के पीछे कोई हिडन एजेंडा काम नहीं करता. इतना खलिहर कोई नहीं कि फिल्मों में एजेंडा घुसेड़ता फिरे. ये तो आप-हम हैं जो नफरतों के फ्लैग बेयरर बनने के लिए मरे जाते हैं.




अजीब मुल्क है हमारा. हम आने वाले हजार-पांच सौ सालों में भी एक बेहतर समाज नहीं बनने वाले. पाखण्ड, ढोंग, हिप्पोक्रिसी तो हमारी रग-रग में खून बन कर दौड़ रही है. हम नेताओं पर, रहनुमाओं पर सारा दोष मंढ़ कर खुद को हर तरह के नैतिक दायित्व से मुक्त कर लेते हैं. शायद इससे सुकून की नींद आ जाती होगी. नेता लड़ाते हैं जी हमें! वरना हम तो इतने भले मानस हैं कि धार्मिक/जातीय/आर्थिक आधार पर कभी किसी को नहीं परखते. भक!! हम इतना तंगदिल, तंगनज़र समाज हैं कि हमें नफरतों के दरिया बहाने के लिए किसी मुखिया की रहनुमाई की कतई ज़रूरत नहीं. ये काम हम खुद ही बाखूबी कर लेते हैं.



मनोरंजन के लिए बनाई गई फिल्मों को भी हम नफरतें फैलाने का टूल बना लेते हैं. इतने प्रतिभाशाली मुल्क में जो न हो जाए थोड़ा है! इस अद्वितीय टैलेंट को सलाम है.



सोर्स:लल्लनटॉप
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know everything about naxalwad and naxalites

naxalwad and naxalites

छत्तीसगढ़ के सुकमा में हुए नक्सली हमले में देश ने अपने 25 जवानों को खो दिया. ऐसा नहीं है कि ये नक्सलियों का पहला हमला था. पिछले कई दशकों में देश ने सैंकड़ों जवानों की शहादत सिर्फ नक्सलवाद के कारण झेली है.


 साल 2010 में 75 जवानों के खून से इन नक्सलियों ने होली खेली थी. आज हम आपको बताएंगे कि आखिर ये नक्सलवाद है क्या. इसकी शुरुआत कहां से हुई थी और कौन थे इस पूरी कहानी के पीछे-



1967 में नक्सलबाड़ी से हुई थी शुरुआत

छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र के अलावा देश के कई कोने आज नक्सलवाद से जूझ रहे हैं. नक्सलवाद की शुरुआत पं. बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से हुई. चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने एक सशस्त्र आंदोलन के तौर पर साल 1967 में इसे जन्म दिया. 


ये दोनों भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता था. मजूमदार, चीनी शासक माओ त्से तुंग का बड़ा फैन बताया जाता है. नक्सलबाड़ी गांव से शुरू हुआ ये किस्सा आज नक्सलवाद के नाम का नासूर बन गया है.



naxalwad and naxalites 
फोटो: ट्विटर/@epicgrams


चारू मजूमदार और कानू सान्याल के विद्रोह की दास्तां

चारू मजूमदार सिलीगुड़ी में पैदा हुआ था. साल 1962 में विद्रोह के कारण उसे जेल भी जाना पड़ा था. जहां उसकी मुलाकात कानू सान्याल से हुई थी. सान्याल का जन्म दार्जिलिंग में हुआ. कानू और मजूमदार का मानना था कि देश में मजदूरों का सरकारी नीतियों और नेताओं के कारण शोषण हो रहा है. इस शोषण को सशस्त्र संघर्ष से ही खत्म किया जा सकता है. जेल से बाहर आने के बाद दोनों ने आंदोलन को व्यापक तौर पर जारी रखा.



1971 के बाद भटक गया आंदोलन

नक्सलबाड़ी गांव में साल 1967 में हुए आंदोलन की अगुवाई कानू सान्याल ने की. बाद में दोनों के कानू और सान्याल के बीच में मतभेद हो गया. साथ ही कम्यूनिस्ट पार्टी में फूट पड़ गई. कई धड़े बन गए. 1972 में मजूमदार की मौत हो जाने के बाद तो पूरा आंदोलन दूसरी दिशा में मुड़ गया. 


धीरे-धीरे इसने आतंक की शक्ल ले ली. कई राज्यों में अलग-अलग गुटों की अपनी सत्ताएं चलती हैं. बता दें कि साल 2010 में कानू सान्याल ने खुद को फांसी लगा ली ती.



कई देशों के नक्सली एक दूसरे से जुड़े हैं

नक्सलियों के बीच बाद में एक समझौता हुआ और कई दलों ने मिलकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी बना ली. बता दें कि अमेरिका ने इस संगठन को आतंकवादी संगठन की सूची में रखा है. ये संगठन दूसरे देशों के कम्युनिस्ट संगठनों के साथ मिलकर भारत में आतंक की जड़ें मजबूत कर रहे हैं. नेपाल की सीपीएन, बांग्लादेश की पीबीएसपी, लाल तारा ऐसी ही पार्टियां हैं जिनका भारतीय नक्सलियों के साथ गठजोड़ है और वो एक दूसरे को मदद भी करती हैं.



कैसे मिलता हैं संसाधन

नक्सली अपने संसाधनों को जुटाने के लिए बड़े-बड़े बिल्डरों, ठेकेदारों और पूंजीपतियों से उगाही का काम करते हैं. हथियार इन पैसों से खरीदे जाते हैं साथ ही पुलिस और सुरक्षाबलों पर हमले कर ये नक्सली उनके हथियार लूट लेते हैं. कई बार तो ऐसी खबरें भी आती हैं कि समाज में हम सब के बीच रहने वाले लोग भी इन नक्सलियों की मदद करने लगते हैं. शायद वो भूल जाते हैं कि इन नक्सलियों हमले में हजारों बेगुनाहों की मौत हो चुकी है. हजारों सुरक्षाबल के जवान जो किसी राजनीतिक पार्टी के लिए काम नहीं करते बल्कि देश के लिए काम करते हैं उनकी जान चली जाती है.



नक्सलवाद को खत्म करने के लिए कारगर कदम की जरूरत

सुकमा में हुए हमले ने देश को एक बार फिर सोचने को मजबूर कर दिया है कि इस समस्या को अब जड़ से खत्म करना ही होगा. सरकार को इसके लिए कड़े कदम उठाने भी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए.




सोर्स:गज़ब इंडिया


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Real Truth how that day titanic sank

 Real Truth how that day titanic sank
  
RMS टाइटेनिक साल 1912 में काफी जद्दोजहद के बाद समंदर में समा गया था. डूबने से पहले वो एक बर्फ की चट्टान से टकरा गया था और उसके बाद संभलने का कोई मौका नहीं रहा


कैसे बना दुनिया का सबसे बड़ा जहाज़?

 जब समंदर से हार मान गया टाइटेनिक




> जहाज़ की लंबाई 291.5 मीटर थी, जो उस दौर का सबसे बड़ा शिप था



> इसमें एक दिन में करीब 825 टन कोयला इस्तेमाल होता था और वो 100 टन राख हर रोज़ निकालता था



> उस वक्‍़त टाइटेनिक को बनाने में करीब 75,00,000 डॉलर का खर्च आया था


टाइटेनिक का खान-पान?

टाइटेनिक का खान-पान? - Food served in Titanic


> हर रोज़ 14,000 गैलन पीने का पानी जहाज़ पर इस्तेमाल होता था


> 40,000 अंडे रोज़ खर्च होते थे


> 1500 गैलन दूध लग जाता था


> 20,000 बीयर और 1,500 वाइन बॉटल ऑन-बोर्ड थीं


> अन्य चीज़ों के अलावा 8,000 सिगार भी इस्तेमाल होते थे



कयामत की वो रात...

कयामत की वो रात... - Horrifying Destructive Night for Titanic 


> 16 लाइफ बोट इस्तेमाल करने में करीब 80 मिनट लग गए. पहली लाइफ बोट में सिर्फ 28 लोग बैठे, क्योंकि बाकी लोगों को लगा ही नहीं कि जहाज़ डूब सकता है



> लाइफ बोट में 472 से ज्‍़यादा लोग आ सकते थे



बचने वाले?

बचने वाले? - survivals of titanic 



> दो कुत्तों के अलावा 706 मुसाफिरों को बचाया जा सके



> 1500 से ज्‍़यादा लोग मारे गए



बर्फ की चट्टान की कहानी?



बर्फ की चट्टान की कहानी? - How Titanic struck an iceberg

> टाइटेनिक को उस चट्टान से टकराने से पहले छह चेतावनी मिली थीं



> टाइटेनिक जब डूबा, तो वो अपने सफर के चौथे दिन में था. ज़मीन से करीब 640 ‌किलोमीटर दूर



> बर्फ की चट्टान दिखने और जहाज़ के उससे टकराने के बीच सिर्फ 30 सेकेंड का फासला था



> जहाज़ को डूबने में 2 घंटे और 40 मिनट लगे





सोर्स:न्यूज़ फ़्लिक्स
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 10 activities performed by engineer students

10-activities-performed-by-engineer-students 

दुनिया का इंसान 12th के बाद कंफ्यूज रहता है कि उसे आगे करना क्या है. सोसाइटी की एक मैंटेलिटी बन चुकी है कि लड़की हो तो डॉक्टर और लड़का हो तो इंजिनियरिंग करनी है. और ये सपना पैरेंट्स अपने बच्चों पर थोप देते हैं बिना ये सोचे और पूछे कि वे खुद का क्या बनना चाहते हैं.


  भारत में तो ये 80% होता है जहां माता-पिता ही बच्चों का भविष्य चुनते हैं. जब लड़के इंजिनियरिंग करने हॉस्टल में रहने जाते हैं तो उनकी कुछ अच्छी तो कुछ बुरी आदतें बन जाती हैं. पिछले दो दशकों से इंजीनियरिंग करने की बहार आ चुकी है भारत के तो हर चौथे घर में इंजीनियर बसा है. 



हर युवा, कैरियर को बेहतर बनाने के लिए इस फील्ड को चुनता है, उसे लगता है कि इसमें सबसे ज्यादा पैसा इसी में है. इसलिए वे बहुत मेहनत करने लग जाते हैं. जिसके साथ कॉलेज लाइफ को भी हैंडल करना होता है. हर इंजीनियरिंग कॉलेज की कहानी एक जैसी ही होती है. 


आज हम आपको कॉलेज लाइफ जी रहे इंजिनियर्स की 10 कॉमन बातें बताएंगे…


1. खुद को सबसे ज्यादा इंटेलिजेंट समझना :


खुद को सबसे ज्यादा इंटेलिजेंट समझना :

हर इंजीनियंरिंग छात्र खुद को कम्प्यूटर का सुपरस्टार समझने लगता है. उन्हें लगता है कि उनके जैसा इंजिनियर तो पैदा ही नही होने वाला. उनके बोलने का तरीका भी कुछ अलग हो जाता है.


2. कुछ नहीं सीखा :


कुछ नहीं सीखा :

टेकनॉलोजी के कॉलेज में कभी कोई छात्र कुछ नही सीखता. इंजीनियंरिंग कॉलेज के बच्चे, अपने हॉस्टल के रूम में ही हर तरह की खुराफात करते रहते हैं और वहीं कुछ ना कुछ नया सीखते हैं. बाकी का बचा हुआ वो नौकरी मिलने पर उस फील्ड में सीखते हैं. कोर्स के दौरान सिर्फ किताबों को पढ़कर परीक्षा ही दे पाते हैं.


3. हर सवाल का जबाव :



हर सवाल का जबाव

हर इंजीनियर को ये सिखाया जाता है कि अगर किसी बात का सवाल बना है तो उसका जवाब भी जरूर बना होगा जिसकी खोज हर इंजिनियर करता रहता है. हर छात्र ऐसी बात को लेकर क्रेजी रहता है. सभी छात्र अपने में ही खोये रहते हैं और कभी-कभी वे दूसरों को पागल लगने लगते हैं.


4. इंटरव्यू में पता चलता है चार साल कुछ किया ही नही :


इंटरव्यू में पता चलता है चार साल कुछ किया ही नही

जब प्लेलसमेंट का समय आता है तो इंटरव्यू् के दौरान सवाल का जबाव ढूंढने का समय नहीं होता और जब खुद में जवाब नही मिलता तब ये लगता है कि पिछले 4 सालों में ना कुछ पढ़ा और ना कुछ सीखा. उस टाइम दिमाग के सारे दरवाजे खोलकर सवाल का जवाब ढूंढा जाता है और उसके बाद कान पकड़कर हर चीज को सही से समझने की प्रतिज्ञा मन ही मन ले ली जाती है.


5. मस्ती टाइम :

मस्ती टाइम


जिन्दगी में जितनी मस्ती इंजीनियंरिंग की पढा़ई में की जाती है शायद ही किसी प्रोफेशनल कोर्स में की जाती होगी. आलस भी सबसे ज्यादा इन्हीं छात्रों को आता है. जब तक एसाइनमेंट की लास्ट डेट नहीं आ जाती है तब तक कोई भी छात्र एसाइनमेंट करने नहीं बैठता है. कोई इसे पहले से करना शुरु नहीं करता सभी एक दूसरे को देखते रहते हैं.


6. जीवन के प्रति कोई गंभीरता नहीं :

 जीवन के प्रति कोई गंभीरता नहीं 


इंजीनियरिंग कॉलेज के दिनों में दिमाग बहुत खुल सा जाता है. छात्र या तो खूब मस्ती करते हैं या तो खूब पढ़ाई बीच की स्थिति इस फील्ड के लोगों में नही होती. हर बात अच्छी लगती है और मस्ती में ही सारा वक्त गुजर जाता है. गंभीरता या नौकरी की टेंशन भी तीसरे साल तक नहीं ही रहती है.


7. टेक फेस्ट :

टेक फेस्ट 



टेक फेस्ट या कल्चरल फेस्टे, कोर्स के दौरान सबसे मस्ती भरे दिन होते हैं, इस दौरान सारे छात्र खूब काम करते हैं और बिंदास होकर मजे भी करते हैं. डिग्री या क्लासेस से ज्यादा फेस्ट में सीखने को मिलता है.


8. मालूम नहीं और एक्जाम देने पहुँच गए :

मालूम नहीं और एक्जाम देने पहुँच गए 




बहुत से ऐसे स्टूडेंट होते है जो रात भर पढ़ते हैं और सुबह बस हाथ मुंह धुल कर इग्जाम हॉल पहुंच जाते हैं और ये सिचुएशन हर स्टूडेंट के साथ होती है कि उन्हें ये मालूम ही नहीं होता है कि आज किस सब्जेक्ट का इंटरनल एक्जाम है.


9. रात 3 बजे मैगी का चस्का :



रात 3 बजे मैगी का चस्का

रात में पढ़ते समय भूख लग जाना स्वाभाविक होता है तो इसके स्टूडेंट्स की सबसे प्यारी मैगी साथ निभाती है. जिसे आराम से आसानी से बनाकर पेट भरा जा सकता है. स्टूडेंट का सबसे अच्छी दोस्त होती है मैगी.


10. कट-कॉपी-पेस्ट :

कट-कॉपी-पेस्ट 


किसी एक के लैपटॉप की मूवी पूरे हॉस्टल तक पहुंचाने का काम कट कॉपी पेस्ट करता है. ऐसे ही डेटा और एसाइनमेंट भी कॉपी कर लिए जाता है मतलब एक मेहनत करे और सभी ऐश करते हैं. बस फिर, क्या सबका काम बन जाता है. कई बार तो फैकल्टी इससे तंग भी हो जाती हैं. कितने स्टूडेंट्स को सजा भी दे जाते हैं.




सोर्स:अज़ाब ग़ज़ब
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