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इस फिल्म में शाहरुख हॉकी प्लेयर और कोच बने थे, वहीं "सुल्तान" में सलमान ने कुश्ती प्लेयर और कोच का रोल किया था.


01. जयदीप साहनी को इस कहानी का आइडिया न्यूज़पेपर की एक छोटी सी स्टोरी से आया था. वे अख़बार पढ़ रहे थे और उसमें भारतीय महिला हॉकी टीम के 2002 के राष्ट्रमंडल खेलों में जीतने की बड़ी खबर को एक छोटी सी जगह में लगाया गया था जो अख़बार के पीछे के पन्नों में कहीं दबा दी गई थी.


 उन्हें हैरानी हुई कि कॉमनवेल्थ गेम्स जितनी बड़ी जीत को फ्रंट पेज पर जगह क्यों नहीं दी गई. यही 2004 में एशिया कप में हुआ जिसमें भारतीय महिला टीम जीती थी. यही जीतें अगर पुरुष टीमों ने हासिल की होती तो जरूर उन्हें पहले पेज पर लगाया जाता. इस गैर-बराबरी को देखने के बाद ‘चक दे! इंडिया’ का जन्म हुआ.


02. इस फिल्म के लिखे जाने की प्रक्रिया ‘बंटी और बबली’ (2005) की शूटिंग के दौरान शुरू हुई. तब फिल्म के रीटिंग सेशन खत्म हुए थे. यशराज फिल्म्स की रानी मुखर्जी और अभिषेक बच्चन स्टारर इस फिल्म को भी जयदीप साहनी ने ही लिखा था. वे प्रोड्यूसर आदित्य चोपड़ा के साथ बैठे थे कि आदि ने पूछा तुम आगे क्या करने की सोच रहे हो? तब जयदीप ने बताया कि कई बरसों से उनके दिमाग में एक कहानी है. इसमें लड़कियों की की एक हॉकी टीम होती है, उनके कोच होते हैं, उनका सपोर्ट स्टाफ होता है और कैसे बिना मोटिवेशन के खेलते-खेलते उन्हें प्रेरणा मिलती है और वे एक के बाद एक मैच जीतती जाती हैं. 


जयदीप ने आधे-एक घंटे में इस कहानी को सुनाया. उन्होंने कहा कि ये कहानी हर किसी को जाननी ही चाहिए. आदि ने अंत में कहा कि चलो इसे करते हैं. उन्होंने भी कहा कि ये फिल्म बननी ही चाहिए. उसके बाद जयदीप ने रिसर्च करनी शुरू की. हॉकी कैंप्स में गए. स्टेडियम्स में गए. टीमों के साथ रुके.


bunty aur babli
यशराज की फिल्म “बंटी और बबली” के पोस्टर में अमिताभ, ऐश्वर्या और अभिषेक बच्चन.


03. इसी दौरान हॉकी कोच का किरदार कबीर खान लिखा गया. फिल्म में शाहरुख ने इसे निभाया था. कबीर पर पाकिस्तान के खिलाफ जानबूझकर भारत को हरवाने के आरोप लगते हैं और उसकी जिदंगी तबाह हो जाती है. बहुत बरस बाद उसे लड़कियों की हॉकी टीम का कोच बनाया जाता है और वो उन्हें विनिंग टीम बनाता है. 


फिल्म में कबीर पर जो झूठे आरोप लगे कुछ वैसा ही असल में हॉकी प्लेयर मीर रंजन नेगी के साथ भी 1982 के एशियाई खेलों में हुआ था. इसी फिल्म में वो सलाहकार भी थे और छोटे से रोल में खुद नजर भी आए. हालांकि वे और जयदीप दोनों ही इससे इनकार करते रहे कि फिल्म में कोच का कैरेक्टर उन पर बेस्ड नहीं है.
 





04. ‘चक दे इंडिया’ से पहले डायरेक्टर शिमित अमीन ने रामगोपाल वर्मा की फिल्म ‘अब तक छप्पन’ बनाई थी जिसमें नाना पाटेकर ने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट का रोल किया था. इस फिल्म में शिमित का ट्रीटमेंट प्रोड्यूसर आदि को याद रह गया था. ऐसे में जब ‘चक दे इंडिया’ के लिए डायरेक्टर ढूंढ़ने की बात आई तो आदि ने जयदीप से कहा कि इसे तो ‘अब तक छप्पन’ वाले से ही बनवाना ठीक रहेगा. फिर शिमित फाइनल हुए. जयदीप हालांकि शिमित को पहले से जानते थे और उनके दोस्त थे.



शाहरुख से सीन डिसकस करते हुए डायरेक्टर शिमित अमीन. (फोटोः यशराज) 
शाहरुख से सीन डिसकस करते हुए डायरेक्टर शिमित अमीन. (फोटोः यशराज)


05. ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में फिल्म का वर्ल्ड कप फाइनल मैच शूट किया जाना था. डायरेक्टर शिमित चाहते थे कि स्टेडियम पूरा भरा हुआ दिखे और दर्शकों की बड़ी संख्या चीयर कर रही हो. ये शूट लगातार पांच रातों तक चलना था. 


अब दिक्कत ये थी कि स्टेडियम भरने के लिए लोग नहीं थे. ऐसे में शाहरुख ने कहा कि स्टेडियम भरने के लिए वे उनके स्टारडम का इस्तेमाल कर सकते हैं. उसके बाद फिल्म की टीम ने सिडनी में प्रचार कर दिया कि शाहरुख वहां ओलंपिक हॉकी स्टेडियम में आने वाले हैं. लोग बड़ी संख्या में उन्हें देखने आए. और लगातार पांच रात आए. 


वे शाहरुख को देखने के लिए वहां आठ-आठ घंटे बैठे रहते थे. शाहरुख भी मैच के बीच-बीच में स्टे़डियम में दर्शकों के आगे चक्कर लगाते थे, दर्शकों को वेव करते थे. जब उनके दृश्यों की शूटिंग नहीं भी हो रही होती थी, तब भी वे ऐसा करते थे.



 फिल्म के क्लाइमैक्स में शाहरुख.
फिल्म के क्लाइमैक्स में शाहरुख.


06. वर्ष 2008 में ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ जैसी ऑस्कर विनिंग फिल्म से डेब्यू करने वाली फ्रीडा पिंटो ने भी ‘चक दे! इंडिया’ में एक हॉकी प्लेयर के रोल के लिए ऑडिशन दिया था. लेकिन उनका सलेक्शन नहीं हुआ.


फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' में फ्रीडा.
फिल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ में फ्रीडा.


07. फिल्म में अंत में भारतीय महिला हॉकी टीम वर्ल्ड कप जीत जाती है. लेकिन जब जयदीप साहनी इसकी स्क्रिप्ट लिख रहे थे तो एकदम आखिर तक उन्होंने तय नहीं किया था कि उनकी कहानी में क्या भारतीय लड़कियां जीतेंगी या नहीं! उन्हें सूझ ही नहीं रहा था. वे जीतने-हारने के बजाय कहानी को आगे बढ़ाते गए और ऐसा करते-करते कहानी अंत में वहां पहुंच जाती है जहां शूटआउट से फैसला होता है.


'चक दे इंडिया' के एक सीन में प्लेयर लड़कियों को गेम समझाते हुए कोच कबीर खान. (फोटोः य़शराज फिल्म्स)
‘चक दे इंडिया’ के एक सीन में प्लेयर लड़कियों को गेम समझाते हुए कोच कबीर खान. (फोटोः य़शराज फिल्म्स)


08. रिलीज से पहले मेकर्स ने एक वीडियो बनाया था जिसमें फिल्म की हॉकी टीम वाली लड़कियों को दिखाया जाता है जिन्हें शाहरुख का कैरेक्टर ट्रेनिंग देता है. इस वीडियो में वो गाना भी रखा गया – “एक हॉकी दूंगी मैं रख के”. 


लोगों का रिएक्शन लेने के लिए इस वीडियो को मल्टीप्लेक्स वालों के यहां भेजा गया. साथ ही मेकर्स ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी दिखाया. मल्टीप्लेक्स वालों ने ये वीडियो वापस भेज दिया और कहा कि थियेटर में लोग इसे देखकर हूटिंग कर रहे हैं और इस गाने में लड़कियों की मजाक उड़ा रहे हैं. प्रदर्शकों का फीडबैक था कि इस गाने को चलाना बंद कर दो नहीं तो ये फिल्म देखने कोई नहीं आएगा.


 जयदीप साहनी का मानना था कि लोगों ने इस वीडियो को पसंद इसलिए नहीं किया क्योंकि वे ये स्वीकार नहीं कर पा रहे थे कि शाहरुख खान की प्लेयर लड़कियां ऐसी कैसी हो सकती हैं. उनके मन में ग्लैमरस हीरोइन्स की कल्पना थी. हालांकि कुछ महीनों बाद जब फिल्म रिलीज हुई तो उन्हीं सब दर्शकों ने इन्हीं सब लड़कियों को बहुत ज्यादा पसंद किया.


09. जब फिल्म रिलीज हुई तो राइटर जयदीप अमेरिका के ऐले में थे क्योंकि वहां भी उसकी स्क्रीनिंग हो रहे थी. उन्होंने ओपनिंग के दिन मुंबई में प्रोड्यूसर यश चोपड़ा को फोन किया. यश जी ने धीमे स्वर में कहा, “बेटा कोई आया ही नहीं.” यानी कि फिल्म देखने लोग नहीं आ रहे. फोन के दूसरी तरफ जयदीप चुप हो गए. यश चोपड़ा ने फिर उनसे कहा कि फिल्म को चाहे एक आदमी भी न देखने आए लेकिन मुझे इस पर गर्व है कि मेरे स्टूडियो का नाम ऐसी फिल्म के साथ जुड़ा हुआ है. हालांकि दूसरे दिन फिल्म हाउसफुल हो गई और लोगों में इसका क्रेज़ बहुत बढ़ गया.



यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा और जयदीप साहनी. (फोटोः यशराज फिल्म्स व अन्य)
यश चोपड़ा, आदित्य चोपड़ा और जयदीप साहनी. (फोटोः यशराज फिल्म्स व अन्य)



10. बताया जाता है कि इस फिल्म की रिलीज के बाद देश में हॉकी स्टिक्स की बिक्री 30 परसेंट तक बढ़ गई थी.


11. सलमान खान को भी इस फिल्म में कबीर खान का लीड रोल ऑफर किया गया था. दरअसल जब स्क्रिप्ट लिखी जा रही थी तब प्रोड्यूसर आदित्य चोपड़ा, डायरेक्टर शिमित और राइटर जयदीप के बीच चर्चा होती चल रही थी और उनके ज़ेहन में हॉकी कोच के रोल में शाहरुख खान ही थे. लेकिन पहला ड्राफ्ट लिखने के बाद जब शाहरुख को अप्रोच किया गया तो उन्होंने कहा कि उनके पास डेट्स नहीं हैं और वो ये प्रोजेक्ट नहीं कर पाएंगे. ऐसे में प्रोड्यूसर आदि ने सलमान खान के साथ इस रोल के लिए मीटिंग की थी. हालांकि आखिर वो रोल सलमान ने नहीं किया. बाद में शाहरुख ने फिल्म साइन कर ली.


फिल्म 'सुल्तान' में रेस्लर के रोल में सलमान खान.
फिल्म ‘सुल्तान’ में रेस्लर के रोल में सलमान खान.

12. ‘चक दे इंडिया एंथम’ को भी सोच-समझकर बनाया गया था. प्रोड्यूसर आदित्य चोपड़ा की अपने डायरेक्टर और कंपोजर्स से मांग थी कि वे एक ऐसा गाना जरूर बनाएं जो स्पोर्ट्स एंथम बन जाए क्योंकि भारत में राष्ट्रगान तो है लेकिन स्पोर्ट्स एंथम नहीं है. बाद में ऐसा ही हुआ. 


“चक दे इंडिया” हॉकी ही क्या भारत के बाकी खेलों में खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने के लिए प्रमुख गाना बन गया. भारतीय क्रिकेट टीम ने जब 2011 में वर्ल्ड कप जीता तो विराट कोहली ने दर्शकों के सामने इसे गाया. जब 2015 के वर्ल्ड कप में भारत ने साउथ अफ्रीका को हराया तो दर्शक ‘चक दे इंडिया’ के नारे लगा रहे थे. इसके अलावा क्रिकेट और की मैचों में ये अनिवार्य रूप से बजता ही है.







सोर्स:लल्लनटॉप
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 hum sath sath hai

भाई-बहन का बंधन सभी बंधनों से अलग और अनोखा होता है. यह बंधन भाई और बहन के बीच प्रेम का प्रतीक है और इसलिए रक्षाबंधन का त्यौहार भाई-बहन के लिए विशेष महत्त्व भी रखता है. बहन अपने भाई की कलाई पर प्यार बांधती है और भाई हमेशा अपनी बहन की रक्षा करने का वादा करता है. भाई बहन के प्यारे रिश्ते को कई बॉलीवुड फिल्म में भी दर्शाया गया है.


आज हम आपके लिए कुछ ऐसी फ़िल्में लेकर आए हैं, जिसे देखकर आपको ज़रूर अपने भाई या बहन की याद आ जाएगी. 


माय ब्रदर निखिल





माय ब्रदर निखिल कहानी है एक ऐसे बहन की को एड्स से पीड़ित अपने भाई के लिए सरकार से भी भीड़ जाती है.



प्यार किया तो डरना क्या





कहानी है एक ऐसे भाई की जो अपनी बहन के प्रेमी की ज़िन्दगी बेहाल कर देता है. वो देखना चाहता है कि वो लड़का उसकी बहन के लायक सच में है या नहीं. फिल्म में सलमान खान, अरबाज़ खान और काजोल मुख्य भूमिका में हैं.



दिल धड़कने दो






दिल धड़कने मॉडर्न भाई-बहन की कहानी है जिसका किरदार निभाया है रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा ने. फिल्म में भाई अपनी बहन को एक ख़राब शादी की बचाने के लिए जी तोड़ कोशिश करता है.



हम साथ साथ हैं






ये पूरी फिल्म भाई बहन के अटूट बंधन पर बनी हुई है. फिल्म में सालमन खान, सैफ अली खान, नीलम और मोहनीश बहल, भाई बहन बने हुए हैं.



जोश





शाहरुख़ और ऐश्वर्या पहली बार इस फिल्म में भाई बहन बने थे. इस नॉटी भाई बहन की कहानी हर किसी के दिल को छु गयी.



अग्निपथ





ऋतिक रोशन इस फिल्म में बड़े भाई बने हुई हैं जो बचपन में अपनी बहन से बिछड़ जाता है लेकिन हर दिन वो अपनी बहन को याद करता है और उसके लिए तड़पता है.



फिज़ा





ऋतिक रोशन और करिश्मा कपूर की ये फिल्म दिखाती है कि एक बहन अपने भाई के लिए किस हद्द तक जा सकती है. फिल्म में एक लड़का खो जाता है और आतंकवादी बन जाता है. उसकी बहन उसे वापस लाने में कोई कसार नहीं छोड़ती.





सोर्स:इंडिया.कॉम
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Kapil Sharma - Sharukh Khan

आगामी फिल्म 'जब हैरी मेट सेजल' को प्रमोट करने शाहरुख खान और अनुष्का शर्मा हाल ही में 'द कपिल शर्मा शो' के सेट पर पहुंचे, लेकिन बिना शूटिंग किए स्टार्स को लौटना पड़ा. बताया जा रहा है कि तनाव से सूझ रहे कपिल शर्मा शाहरुख-अनुष्का के आने से पहले ही सेट पर बेहोश हो गए थे. हिंदोस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शुक्रवार रात कपिल शर्मा को शाहरुख-अनुष्का के साथ 'जब हैरी मेट सेजल' का प्रमोशनल एपिसोड शूट करना था, लेकिन वे सेट पर बेहोश हो गए. 



शो की टीआरपी को बढ़ाने के लिए कपिल शर्मा पिछले कई दिनों से तनाव में काम कर रहे हैं. शायद इसी तनाव की वजह से वह सेट पर बेहोश हो गए. एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा को बिना शूटिंग किए सेट से वापस लौटते हुए देखा गाया था. अनुष्का के फैनक्लब ने इसकी तस्वीर जारी की. कपिल शर्मा पिछले कई दिनों से तनाव में चल रहे हैं. 



आगामी फिल्म 'गेस्ट इन लंदन' की टीम भी हाल ही में फिल्म को प्रमोट करने कपिल के शो में आई थी, लेकिन कपिल की तबीयत बिगड़ने की वजह से शूट कैंसल करना पड़ा. वह शो के बारे में कुछ ज्यादा ही सोच रही हैं, जो उनकी तबीयत पर असर डाल रहा है.



कथित तौर पर शो की टीआरपी घट रही है, जिसे बढ़ाने के लिए कपिल जी-जान लगा रहे है. इसके साथ ही उनके प्रतिद्वंद्वी कृष्णा अभिषेक का नया शो 'द ड्रामा कंपनी' उन्हें के चैनल (सोनी टीवी) पर लॉन्च होने को तैयार है. शायद इसी वजह से कपिल तनाव में है. 



कपिल शर्मा की पुरानी क्रिएटिव डायरेक्टर प्रीति सीमोंस और उनके को-स्टार रहे अली असगर ने भी कृष्णा से हाथ मिला लिया है. हिंदोस्तान टाइम्स के सूत्रों के मुताबिक, अब जब कॉमेडियन कृष्णा अभिषेक का नया शो भी इसी चैनल पर शुरू हो रहा है तो कपिल शर्मा के लिए यह मुश्किलों से भरा साबित हो सकता है."



इसी बीच कपिल शर्मा के पुराने दोस्त और को-स्टार रहे चंदन प्रभाकर ने 'द कपिल शर्मा शो' में वापसी कर ली है. कपिल ने भारती सिंह और उनके मंगेतर हर्ष लिंबाचिया को भी गेस्ट कास्ट के तौर पर साइन किया है.



सोर्स:NDTV
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वर्ल्ड के बहुत से फिल्म फेस्टिवल्स में देखी और सराही जा रही डॉक्यूमेंट्री An Insignificant Man को पास करने के लिए भारत में सेंसर बोर्ड ने ऐसी शर्त रखी दी है जो बहुत बचकानी है और जिसे पूरा करना संभव नहीं है. इसे डायरेक्ट करने वाले विनय शुक्ला और खुशबू रांका से हमने बात की जिन्होंने बताया कि वे आगे क्या रणनीति बना रहे हैं.


जेनेवा में भारतीय डॉक्यूमेंट्री An Insignificant Controversy देखते हुए ब्राजील की पूर्व-राष्ट्रपति डिल्मा रूज़ेफ.





‘शिप ऑफ थिसीयस’ फेम फिल्ममेकर आनंद गांधी ने ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ यानी ‘एक आम/मामूली आदमी’ नाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म प्रोड्यूस की है. इसे दो युवाओं ने डायरेक्ट किया है – खुशबू रांका और विनय शुक्ला. इन दोनों ने दिसंबर 2012 में यानी करीब पांच साल पहले इसे शूट करना शुरू किया था. तब भारतीय राजनीति में आम आदमी पार्टी की एंट्री होने वाली थी. खुशबू और विनय ने पार्टी की अंदरूनी बैठकों, सम्मेलनों, घटनाओं और लोगों को वीडियो कैमरा लेकर फॉलो किया.




लंबे समय तक बनने वाली इस फिल्म का प्रीमियर दुनिया के बहुत प्रतिष्ठित टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल-2016 में 11 सितंबर को हुआ. फिर अक्टूबर में भारत में इसे मामी फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया. तब से फ्रांस, अर्जेंटीना, कैनेडा, ऑस्ट्रेलिया, मैक्सिको, इज़रायल, न्यू यॉर्क जैसी कई जगह इसकी स्क्रीनिंग हो चुकी है और सब जगह उत्साहित करने वाली प्रतिक्रियाएं आई हैं.



दो महीने पहले 30 मार्च में स्विट्जरलैंड के जेनेवा में ब्राजील की पूर्व-राष्ट्रपति डिल्मा रूज़ेफ भी भीड़ में बैठकर An Insignificant Man देखती नजर आई थीं. 1997 में ‘द आइडिया ऑफ इंडिया’ जैसी बेहद महत्वपूर्ण और आइकॉनिक बुक लिखने वाले सुनील खिलनानी ने इस डॉक्यूमेंट्री के बारे में लिखा, “भारतीय लोकतंत्र और दुनिया में जहां भी पॉपुलर पॉलिटिक्स है उनके छायांकन में ये एक लैंडमार्क है.”

सुनील खिलनानी और उनका कमेंट.

अब फिल्म को भारत में रिलीज करने की तैयारी है लेकिन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने उसे सर्टिफिकेट नहीं दिया है. डायरेक्टर्स का कहना है कि बोर्ड के प्रमुख पहलाज निहलानी ने उन्हें कहा है कि फिल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और दिल्ली की पूर्व-मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की फुटेज फिल्म में है इसलिए फिल्म को सर्टिफिकेट तभी मिलेगा जब वे लोग इन तीनों से अनापत्ति प्रमाण पत्र यानी No Objection Certificate लेकर आएं.



इस किस्म की मांग सेंसर बोर्ड ने पहले की हो याद नहीं आता. क्योंकि राजनेता पब्लिक फिगर हैं और वे पब्लिक रैलियों में क्या बोलते हैं उसे कला जगत में पुनर्निर्मित करने के लिए किसी मंजूरी की जरूरी नहीं है. ये काम पत्रकार, कलाकार, लेखक तब से करते आए हैं जब लोकतंत्र बना भी न था. लेकिन पहलाज निहलानी इससे पहले भी हैरान करने वाले फैसले ले चुके हैं. जैसे उन्होंने ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ को इसलिए पास करने से मना कर दिया क्योंकि उनको ये लेडी ओरिएन्टेड फिल्म लगी जिससे शायद समाज खराब हो जाता.

ख़ुशबू और विनय.

सारी बात जानने के लिए दि लल्लनटॉप ने फिल्म के डायरेक्टर विनय शुक्ला और खुशबू रांका से बात की जो यहां प्रस्तुत हैः

पूरा पोस्ट पढे दि लल्लनटॉप पर


कब अप्लाई किया था आपने सेंसर सर्टिफिकेट के लिए और अब तक क्या हो चुका है?

खुशबूः 
हमने फरवरी में अप्लाई किया था. जब एग्जामिनिंग कमिटी ने फिल्म देखी तो हम वहीं पर थे. आमतौर पर ये होता है कि सीबीएफसी के लोग वहां मौजूद फिल्ममेकर्स को भी एंगेज करते हैं और उन्हें फिल्म को लेकर कोई भी इश्यू होता है तो वो उनको अपना पक्ष रखने का मौका देते हैं. लेकिन बोर्ड के लोगों ने  हमसे ऐसी कोई बात नहीं की. बस इतना कहा कि आपको हम लेटर भेजेंगे.


बाद में उन्होंने लेटर भेजा तो उसमें लिखा था कि ये फिल्म अगली कमिटी को रेफर की जा रही है क्योंकि इसको हम अभी सर्टिफिकेट नहीं दे सकते. और उन्होंने कोई रीज़न नहीं दिया था. ये असामान्य बात थी क्योंकि वो लोग जब भी किसी फिल्म को अगली कमिटी को रेफर करते हैं तो अकसर वजह बताते हैं. जैसे कि ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ के टाइम उन्होंने कहा था कि ‘लेडी ओरिएंटेड’ फिल्म है. हमें कुछ नहीं कहा.


तो हमारे कई दिन तो यही पूछने में निकल गए कि हमें बता दीजिए फिल्म से आपको प्रॉब्लम क्या है ताकि सॉल्यूशन ढूंढ़ सकें. हम पहलाज निहलानी के ऑफिस में गए तो उन्होंने अपने पीयून को बोला कि इन लोगों को बाहर निकाल दो.


ये सब हुआ तो फाइनली हमने रिवाइजिंग कमिटी में अप्लाई किया जहां निहलानी भी थे, उन्होंने फिल्म देखी और कहा कि आप पीएम (नरेंद्र मोदी), अरविंद केजरीवाल और शीला दीक्षित का एनओसी (No Objection Certificate) ले आइए. इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस का नाम फिल्म में जहां लिया जा रहा है वो बीप कर दीजिए. फिर आप रिलीज कर सकते हैं.

मैक्सिको के एम्ब्युलांते में 16 मई को हुई इस डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का एक दृश्य. (फोटोः फेसबुक)



अगर कोई उपाय निकल आता है तो आप कब तक इसे रिलीज करना चाहते हैं.

विनय शुक्लाः 
हम जल्द से जल्द रिलीज करना चाहते हैं. फिल्म सितंबर में प्रीमियर हुई है तब से हमारी कोशिश यही थी कि फिल्म इंडिया में जल्द से जल्द सिनेमाघरों में लग जाए. जैसे ही किसी प्रकार का क्लीयरेंस मिलता है, हम रिलीज कर देंगे.



अगर कोर्ट में बात जाती है और समय लग जाता है तो आपको रिलीज आगे भी बढ़ानी पड़ सकती है?

विनयः 
अब इसमें हमारे हाथ थोड़े बंधे हुए हैं. जैसा कि आप जानते हैं 800 लोगों से इस फिल्म को क्राउडफंड किया था और वो इसे जल्द से जल्द रिलीज होते देखना चाहते हैं. अभी फिल्म के आस-पास उत्साह भी है और जैसे-जैसे समय गुजरता है उत्साह भी कम होता है. अभी ये प्रोसेस फरवरी से चल रहा है. अब उन्होंने तो कह दिया कि एनओसी लेकर आइए लेकिन हमारे पास ऑप्शन कम है और समय ज्यादा लग रहा है.


फिल्म भारत में प्रीमियर हुई और बाहर के फिल्म फेस्टिवल्स में लगातार जा रही है, रिव्यूज़ काफी अच्छे हैं.

विनयः 
और इस पर (सेंसरिंग) खुली चर्चा होनी चाहिए लगातार. लोग इसे देख लें. फिर चाहे उन्हें अच्छी लगे या न लगे. लेकिन किसी फिल्म को रोक लेना ठीक नहीं. यहां पर ये लोग (निहलानी) ऐसा नहीं कह रहे कि हम पास नहीं होने देंगे. क्योंकि ऐसा बोलेंगे तो हाय-हल्ला हो जाएगा. लेकिन ये आपके सामने ऐसी असंभव शर्त रख देते हैं जो पूरी नहीं हो सकती. और मोदी या केजरीवाल का एनओसी लाने की बात? भला कौन एनओसी लाया है किसी का. ऐसे तो कोई जर्नलिस्ट अपना काम ही नहीं कर पाएगा. फिर तो आप कोलगेट स्कैम पर स्टोरी करने जाएंगे और मैं कह दूंगा कि पहले आप कांग्रेस पार्टी से एनओसी लेकर आइए तो ये कैसे होगा!


इस विवाद पर प्रोड्यूसर आनंद गांधी कहते हैंः




उन्होंने रवीना टंडन या सलमान खान का उदाहरण दिया कि इनके नाम जिन फिल्मों में यूज़ हुए उनमें भी एनओसी ली गई थी. हालांकि फर्क ये है कि वो फिक्शनल-कमर्शियल एंटरटेनमेंट था लेकिन ये फिल्म सार्वजनिक दायरे में राजनेताओं या उनकी बातों का डॉक्यूमेंट है जिसकी एनओसी लेने का लॉजिक भी नहीं बनता और पूर्व-उदाहरण भी नहीं याद आता?

खुशबूः 
एग्जैक्टली, पर उसमें भी मुझे लगता है कि रवीना की एनओसी लेने की जरूरत नहीं है, या फिर सलमान खान की. अगर वो ऐसा करवा रहे हैं तो लोगों को इस पर आपत्ति लेनी चाहिए. सलमान खान और रवीना भी पब्लिक फिगर हैं. पहले भी फिल्मों में लोग अमिताभ बच्चन का नाम लेते थे, उसका एक पोएटिक कॉन्टैक्स होता है. उसे पॉलिटिकली नहीं लेना चाहिए. कोई तो स्पेस होना चाहिए जहां लोग अपने मन का कह सके. अगर सलमान खान पर भी किसी का कोई ओपिनियन है तो क्या उसके लिए एनओसी लेंगे?



सीबीएफसी ने हाल के दिनों में ‘लंच’, ‘सरकार’, ‘आदिवासी’ जैसे शब्दों तक पर आपत्ति की है जो किसी भी लिहाज से आपत्तिजनक नहीं हैं.

खुशबूः 
जैसे ‘मन की बात’ भी सेंसर किया गया. सबसे खास बात है ये कि वो किस हिसाब से ये सारी सेंसरिंग कर रहे हैं. बिलकुल मनमाने ढंग से कर रहे हैं. कभी कुछ पास कर भी रहे हैं और कभी नहीं भी कर रहे हैं.



आशा पारेख ने कहा है कि सरकार की गाइडलाइन्स के हिसाब से पहलाज निहलानी सही काम कर रहे हैं.

खुशबूः
 मुझे नहीं लगता वो गाइडलाइन्स के दायरे में कर रहे हैं. दिशा-निर्देश खुद ही अस्पष्ट हैं, उनको किसी भी तरीके से इंटरप्रेट किया जा सकता है. अगर वो सही कर रहे हैं तो पॉसिबल ही नहीं है कि कोर्ट में उनके फैसलों को बदलना जो कि लगातार हो रहा है.

विनयः आपको ये बात भी याद रखनी होगी कि आशा पारेख खुद सीबीएफसी चेयरमैन थीं, तो वो ऐसा ही कहेंगी. खुशबू ने इस पर बहुत सही कहा है कि अगर वो सही काम कर रहे हैं तो कोर्ट बार बार उनको फटकार क्यों लगा रहा है.



‘बैटल ऑफ बनारस’ डॉक्यूमेंट्री भी रुकी हुई है. उसका कंटेंट भी आपकी फिल्म जैसा ही है. उसमें 2014 के आम चुनाव में बनारस सीट पर नरेंद्र मोदी, अरविंद केजरीवाल और अन्य प्रत्याशियों के मुकाबले को कैप्चर किया गया है.

खुशबूः 
हमने देखी नहीं है वो फिल्म लेकिन बात यही है कि अगर आप पॉलिटिक्स से इंगेज ही नहीं करने देंगे तो क्या होगा! अगर रोज सुबह उठकर ये सुनेंगे कि आज किसे नहीं बोलने दिया गया? ये अलग-अलग फिल्मों के साथ होता रहेगा जब तक कोई ठोस सॉल्यूशन नहीं निकलता.



आनंद गांधी जो An Insignificant Man के प्रोड्यूसर हैं, क्या मानते हैं सेंसरशिप का लंबी दूरी में इलाज क्या है?

विनयः 
सीधी बात है कि ये सेंसर नहीं सर्टिफिकेशन बोर्ड है. उन्हें अपना रोल ठीक करना पड़ेगा. कि ये जिस काम के लिए बने हैं वो काम करें. ये फिलहाल हमें कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी, केजरीवाल, शीला दीक्षित के एनओसी लेकर आइए. ये इनका काम ही नहीं है! कल को इन तीनों को हमारी फिल्म से प्रॉब्लम होगी तो वो हमारे खिलाफ किसी भी कोर्ट में केस करने या कोई भी आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए स्वतंत्र हैं. इस देश का नागरिक होने के नाते ये हम सबकी जिम्मेदारी है कि हम संविधान और एक-दूसरे के वैयक्तिक अधिकारों की इज्जत करें. फिलहाल सेंसर बोर्ड जैसे काम करता है वो गलत है, इसमें कोई दो राय नहीं है.


खुशबूः एक देश के तौर पर अगर हम प्रोग्रेस करना चाहते हैं, तो और ज्यादा फ्रीडम के माहौल में ही ऐसा कर पाएंगे. हमने ऐसा कहां पढ़ा या सुना है कि कोई ऐसा देश है जिसने अपने नागरिकों का फ्रीडम कम किया और बहुत आगे बढ़ गया? प्रोग्रेस और फ्रीडम के बीच सीधा संबंध है. अगर हमें प्रगतिशील होना है तो सेंसरशिप को समझना होगा, हम छोटी-छोटी बात पर ये नहीं कर सकते.



फिल्म का ट्रेलरः



फिल्म के दूसरे मजबूत स्तंभ हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी जो अपने बहते अभिनय से फिल्म का दूसरा सिरा संभाले हुए हैं और इनके साथ जिशान और नरेंद्र झा फिल्म के बाकी सफर को आसान बनाते हैं. 'रईस' के डायलॉग आपको ताली और सीटियां बजाने पर मजबूर कर देंगे. स्क्रिप्ट कसी हुई है और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को और रोचक बनता है, दृश्यों का फिल्मांकन प्रभावशाली है जिसके लिए निर्देशक और सिनेमेटोग्राफर दोनों ही तारीफ के पात्र हैं.




कहानी 





रईस का नाम बचपन से रईस था. क्योंकि एक दिन वो रईस बनने वाला था. वैसे एक दिन तो वो स्मगलर भी बनने वाला था. लेकिन वो हीरो था इसलिए उसका नाम रईस रखा गया. 




उसकी अम्मी जान कहा करती थीं, कोई भी धंधा छोटा नहीं होता. चाहे वो स्मगलिंग का ही हो. इसलिए रईस ने दारू की स्मगलिंग शुरू कर दी. लोगों को खूब बेवकूफ बनाया. काला धन बनाया. वो भी गुजरात में रहकर, बताओ! फिर गरीबों को घर देने के नाम से सारा काला धन सफ़ेद कर लिया. लेकिन वो शाहरुख़ खान है, इसलिए उसका सब कुछ सफ़ेद होगा, कुरते की तरह.



हां तो रईस, रईस बहुत थे. लेकिन चश्मा एक ही पहने, जवानी से लेकर मौत तक. उसका एक बार लेंस चटक गया, तो जिसने तोड़ा उसी ने लेंस बदलवाकर दिया. और जिस पावर का दिया, रईस के चश्मे का नंबर फिर वही हो गया, लेकिन फ्रेम नहीं बदला. चश्मे से याद आया, काजल जाने कौन सा लगाता था, ससुरा कभी फैला नहीं. हमको भी वही ‘स्मज फ्री’ वाला चाहिए.




खैर. तो रईस के घर में नेटफ्लिक्स कनेक्शन था. अब पूछो उस समय जब मोबाइल भी नहीं होते थे, तब नेटफ्लिक्स कैसे मिला. तो बदले में हम पूछेंगे कि उसने ‘नार्कोस’ कैसे देखा. काहे से फिल्म का प्लॉट कुछ चुराया सा लग रहा था. पूरा नहीं, लेकिन काफी रेफरेंस. जैसे धंधे के पैसे गरीबों में बांटना, उनका सपोर्ट जीतना. 



छोटे बच्चों को अपना खबरी बनाना जिन पर कोई शक न करे. फिर विधायकी का इलेक्शन लड़कर जीत जाना. उनको काम देना और उनके बीच हीरो बन जाना. फर्क सिर्फ ये है कि हमारा डॉन गरबा भी कर लेता है, पतंग उड़ा लेता है, क्रिकेट खेल लेता है, गा लेता है और फ़्लर्ट भी कर लेता है.




रईस पहले जयराज के यहां नौकरी करता था. फिर उसने कहा, खुद का धंधा करते हैं. धंधा करने के लिए क्या चाहिए – बनिए का दिमाग और मियांभाई की डेयरिंग. ‘बनिए’ वाली बात जातिवादी थी. 



फेसबुक पर पोस्ट कर देते तो बचते नहीं. डेयरिंग बहुत थी. पैसा नहीं था. कूटे गए. खूब पिटे. अश्मा-चश्मा कुल टूट गया. लेकिन तोड़ने वाला इम्प्रेस हो गया. बोला लो, लाख रुपया, करो धंधा! हैपेन्स ओनली इन बॉलीवुड. बाद में उसी चश्मे से उसकी जान ली. चश्मे से किसी का खून कैसे करते हैं, ये देखने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.




अब बात ‘आसिया’ की. यानी फिल्म की हिरोइन. वो रईस के इम्प्रेस थी. क्योंकि रईस का काजल स्मज फ्री था. उसके बाद रईस ने आसिया की पतंग भी काट दी. तो प्यार हो गया. 



आसिया ने रईस के साथ खूब गाने गाए. एक मिलने के बाद, एक निकाह के बाद, एक बच्चा होने के बाद. बच्चे भगवान के भेजे गए दूत होते हैं. ये बात रईस में साबित हुई है. क्योंकि आसिया का कभी बेबी बंप दिखा ही नहीं. बस रईस से बोला ‘आपको कोई अब्बू बुलाए तो कैसा लगेगा?’, और फिर बच्चा हो गया. जमाना एक्सप्रेस डिलीवरी का है.




अब बात नवाजुद्दीन की. यानी IPS अफसर मजमूदार. पुलिसवाला बनने के लिए क्या लगता है? एक-आध डायलॉग और रे बैन के एविएटर्स. दोनों ही थे. लेकिन ट्रांसफर होता रहा. मतलब, ऑबवियसली. कड़क और ईमानदार अफसर के साथ और होता ही क्या है. लेकिन ट्रांसफर के बाद भी वो रईस को न छोड़ने की कसम खाता है. और अंत में भी वही हुआ जो होना था. मन की करके भी वो दुखी होता है.




रईस तो बस गुंडे मवालियों को मारता था. लेकिन एक नासपीटे ने उसके माल में RDX मिला दिया था. जिससे देश भर में धमाके हुए. बहुत लोग मरे. बस इसी गलती की सजा चुकानी पड़ी उसको. वरना आदमी ठीक था. अब कहोगे कहानी बता दी.




बात माहिरा खान की. समझ नहीं आया कि इतने कम और बुरे रोल के लिए किसी को लेना था तो पाकिस्तानी हिरोइन लेकर अपनी टेंशन क्यों बढ़ाई? गाने और डांस के लिए किसी को भी ले लेते. माहिरा टैलेंटेड बहुत हैं, एक शब्द बोलने में भी तीन एक्सप्रेशन दे लेती हैं. रईस से बात बात पर रूठना उनका फेवरेट काम है. लिपस्टिक लगाना और गालों पर लाली मलना कभी नहीं भूलतीं.




फिल्म लंबे वीकेंड के पहले रिलीज की गई है. ताकि देखने के बाद चार दिन इसे भुलाने में लगा सकें.




समझ ही गए होंगे कि फिल्म पकाऊ है. बेसिकली इसलिए, क्योंकि कहानी में कुछ भी नया नहीं है. ये सब हम बॉलीवुड की अलग-अलग फिल्मों में देख चुके है. 



रईस का चरित्र एक अच्छे विलेन (हीरो) और नवाज का किरदार एक अच्छे हीरो (विलेन) के रूप में कोई गहरी छाप छोड़ने में नाकाम हैं. शाहरुख़ बस शाहरुख़ हैं, और फिल्म एक बार फिर उनके स्टारडम को भुनाने में लग जाएगी.



संगीत की बात करें तो 'उड़ी उड़ी जाए', 'जालिमा', 'लैला मैं लैला' जैसे गाने पहले ही हिट हो चुके हैं. एक और बात यह कि फिल्म 70 और 80 के दशक के सिनमा से प्रभावित है और इसका ट्रीटमेंट भी उसी तरह किया गया है क्योंकि यह कहानी 80 के दशक में घटती है. 



यह फिल्म आपको लार्जर दैन लाइफ सिनेमा और उनके नायकों की एक बार फिर याद दिलाएगी जहां बहुत सा मनोरंजन, एक दबंग हीरो और बेहतरीन गाने देखने को मिलते थे. ठीक उसी तरह शाहरुख खान की फिल्म में मनोरंजन है पर वास्तविकता की झलक के साथ यानी हर चीज यहां ओवर दी टॉप या बनावटी नजर नहीं आएगी. तो जाइए फिल्म देखिए??????



रईस का ट्रेलरः









सोर्स:लल्लनटॉप । NDTV 
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