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युद्ध कभी शांति नही दे सकता। हिरोशिमा का नाम तो सुना होगा। वहां आज भी उस विनाशकारी युद्ध से पनपे गहरे जख्म भरे नहीं हैं। 1945 में अमेरिका द्वारा जापान के दो शहरों पर छोड़े गये परमाणु बम ने धरती की तस्वीर बदल के रख दी। इतिहास ने भी यह माना है कि यह युद्ध नहीं बल्कि एक नरसंहार था, जिसमें इंसानियत का नाम मिटाने के लिए परमाणु शक्तियों का इस्तेमाल सीधे मानवजाति पर किया गया था।











फिर आया 1960 का दशक। जब शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका की परमाणु ताकत सोवियत रूस के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी।



अमेरिका के पास रूस को निशाना बना सकने वाली लंबी दूरी की 170 से ज्यादा अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें थीं, जबकि सोवियत रूस के पास ऐसी दर्जनभर मिसाइलें ही थीं। ताकत के इस अंसुतलन को दूर करने के लिए सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव ने अमेरिका के पड़ोसी कम्युनिस्ट देश क्यूबा में गुपचुप तरीके से रूसी परमाणु मिसाइलें तैनात कर दीं।




ऊंचाई पर उड़ने वाले अमेरिकी खोजी विमानों ने क्यूबा में इन मिसाइलों की तैनाती का पता लगा लिया। इसके साथ ही 16 अक्टूबर 1962 को क्यूबा मिसाइल संकट की शुरुआत हो गई। रूसी परमाणु हमले की आशंका में अमेरिका में खौफ का माहौल बन गया।







1962 में क्यूबा के मिसाइल संकट को आमतौर पर एक ऐसा ऐतिहासिक बिंदु मना जाता है, जिसपर विश्व युद्ध 3 का जोखिम सबसे करीब सोचा गया था। जानकारो के अनुसार उस वक़्त 13 दिन तक दुनिया पर तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा मंडराता रहा था। उस वक़्त अगर सोवियत नौसेना के एक अधिकारी ने इस परमाणु सामरिक युद्ध को टाला नहीं होता तो आज दुनिया की तस्वीर कुछ और ही होती।



वैसिली अलेक्जेंडरोविच आर्खिपोव एक सोवियत नौसेना अधिकारी थे। वे एक परमाणु हथियारों से लैस पनडुब्बी में सवार थे, जिसको अमेरिका पर परमाणु हमला करने के आदेश मिल चुके थे। लेकिन अरखिपोव के एक समझदारी भरे फैसले ने विश्व को संभवतः सबसे बड़े विनाश से बचा लिया।








आर्खिपोव कैरेबियन सागर में परमाणु हथियारों से लैस सोवियत पनडुब्बी बी-59 के जहाज पर दूसरे कमांडिंग अधिकारी थे। इससे पहले उनका ताल्लुक हिरोशिमा से भी जुड़ा है। जब उन्होने परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल से लैस एक पनडुब्बी के-19 को कूलेंट रिएक्टर के विफल हो जाने के बाद ध्वस्त हो जाने से बचाया था। हालांकि इस दुर्घटना में वे परमाणु रेडीयेशन फैलने के कारण बुरी तरह से ज़ख्मी हो गए और पनडुब्बी में सवार उनके ज्यादातर साथी मारे गए थे।



जब आर्खिपोव अकेले डटे रहे परमाणु बम के ना छोड़े जाने के फैसले पर


संयुक्त राज्य अमेरिका की विध्वंसक नौसेना और घातक विमान वाहक पोत के एक लड़ाकू बेड़े को ये ज्ञात हो जाता है कि सोवियत फ़ाक्सत्रोट-वर्ग की परमाणु हथियारों से लैस एक पनडुब्बी बी-59 क्यूबा के पास स्थित है।








इस पर सोवियत मिसाइलों की तैनाती के जवाब में अमेरिका ने क्यूबा के समुद्री इलाके की घेराबंदी कर दी। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पहली बार अमेरिकी परमाणु मिसाइलों को आपात स्थिति में ले आया गया। इस आपात स्थिति के तहत अमेरिकी सेनाओं को हमले की इजाजत मिल जाती है।



इटली और तुर्की के गुप्त अमेरिकी अड्डों में परमाणु मिसाइलों का मुंह सोवियत संघ की तरफ मोड़ दिया गया। 13 दिन तक समूची दुनिया तीसरे विश्वयुद्ध की आशंका में कांपती रही। लेकिन आर्खिपोव और पनडुब्बी सोवियत बी-59 के जहाज में कुछ और ही चल रहा था।


जिस सोवियत जहाज बी-59 में आर्खिपोव तैनात थे उसके कैप्टन सविट्स्की थे। उनको युद्ध की स्थिति में अमेरिका पर परमाणु टारपीडो दागने के सीधे आदेश मिले थे, जिसके लिए सिर्फ राजनीतिक अधिकारी की ही सहमति लेनी होती थी।






इधर अमेरिका बेड़ा सोवियत पनडुब्बी बी-59 को नेस्तनाबूद करने के लिए मिसाइलों का उपयोग कर रहा था। मिसाइलों के प्रहार से बचने के लिए सोवियत जहाज बी-59 समुंदर के बहुत गहराई में चला गया, जहां रेडियो सिग्नल प्रणाली कार्य करने में विफल थी। युद्ध की स्थिति बनते देख कैप्टन सविट्स्की ने आदेशानुसार परमाणु मिसाइल दागने की योजना बना ली।



हालांकि, नियम यह भी कहते थे कि युद्ध की स्थिति में किसी राजनीतिक अधिकारी से भी परमर्श ली जाए। चूंकि आर्खिपोव इससे पहले परमाणु संबंधित मामले में बखूबी के-19 पनडुब्बी में अपनी अहम भूमिका निभा चुके थे, इसलिए उन्होने कैप्टन सविट्स्की को राज़ी कर लिया क़ि वो मास्को से आदेश आजाने तक इंतज़ार कर ले। आर्खिपोव परमाणु से हुए विनाश को जानते थे। उनके एक परामर्श ने तीसरे विश्वयुद्ध होने से बचा लिया था।







इसी बीच पूरी दुनिया की तरफ से दोनों मुल्कों पर समझौते का भारी दबाव पड़ा। आखिरकार एक गुप्त समझौते के तहत सोवियत संघ ने क्यूबा से मिसाइलें हटाने का फैसला किया, जिसके जवाब में अमेरिका ने जगह-जगह तैनात अपनी मिसाइलें भी हटाने की सहमति दे दी। अगर उस वक्त आर्खिपोव ने युद्ध की स्थिति में परमाणु बम दागने का नियम ना तोड़ा होता तो शायद आज धरती की तस्वीर कुछ और होती।



आर्खिपोव का जीवन


आर्खिपोव ने 1980 के मध्य तक सोवियत नौसेना को अपनी सेवाएं दी। उनको 1975 में रियर एडमिरल के पद पर पदोन्नत किया गया और उनकी 1975 में 73 साल की उम्र में मृत्यु हो गई।





सोचिए अगर आर्खिपोव ने आदेश ना मानने की ग़लती या मानवता की नज़र में वह एक समझदारी ना की होती तो आज धरती की तस्वीर कैसी होती? अपनी राय दीजिए।



सोर्स:टॉप याप्स 



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अगर आप अब तक गूगल क्रोम ब्राउजर के पुराने वर्संस पर काम कर रहे हैं, तो गूगल आपकी स्क्रीन पर क्रोम अपडेट करने की चेतावनी दिखा सकता है। 




 8 फरवरी के बाद से आपके पुराने क्रोम वर्सन पर जीमेल काम नहीं करेगा। असुविधा से बचने के लिए ब्राउजर को क्रोम 55 में अपग्रेड कर लें। बता दें कि क्रोम 55 में जरूरी सिक्यॉरिटी अपडेट्स भी जोड़े गए हैं, जो सेफ सर्फिंग में खासा मददगार साबित होंगे।



इसी के साथ ही अगर आप अभी Windows XP और Windows Vista पर अब तक काम कर रहे हैं, तो आपका काम प्रभावित हो सकता है। क्रोम 49 के बाद गूगल सभी आउटडेटिड ऑपरेटिंग सिस्टम्स को सपॉर्ट करना बंद कर देगा।



 माइक्रोसॉफ्ट विंडोज़ एक्सपी और विस्टा को सपॉर्ट नहीं करेगा, अगर आप इसका इस्तेमाल जारी रखते हैं, तो आपको असुविधा होगी। बेहतर है कि तय तारीख तक आप इसे अपग्रेड कर लें या किसी जानकार की मदद से अपग्रेड करवा लें।




बुधवार को एक ब्लॉग पोस्ट के जरिए गूगल ने बताया, अगर आप अपग्रेड नहीं करते हैं, तो जीमेल क्रोम 53 और उससे नीचे के वर्जन पर साल के अंत तक काम करना जारी रखेगा, लेकिन दिसंबर 2017 तक यदि आप ब्राउजर अपग्रेड नहीं करेंगे, तो यह आपको पुराने एचटीएमएल वर्सन पर ले जाना शुरू कर देगा।


बुधवार को एक ब्लॉग पोस्ट के जरिए गूगल ने बताया, अगर आप अपग्रेड नहीं करते हैं, तो जीमेल क्रोम 53 और उससे नीचे के वर्संस पर साल के अंत तक काम करना जारी रखेगा, लेकिन दिसंबर 2017 तक यदि आप ब्राउजर अपग्रेड नहीं करेंगे, तो यह आपको पुराने एचटीएमएल वर्सन पर ले जाना शुरू कर देगा।




साल 2013 में गूगल ने कहा था कि वह क्रोम को एक्सपी पर सॉपर्ट करना अप्रैल 2015 तक जारी रखेगा। बाद में यह तारीख आगे बढ़कर साल के अंत तक हो गई। 




नवंबर में गूगल ने कहा कि अब वह एक्सपी, विस्टा व मैक ओएस एक्स के पुराने वर्संस को सपॉर्ट करना 2016 में बंद कर देगा, जो उसने क्रोम 49 के साथ किया भी। 





आपने मौजूदा वर्जन को जानने के लिए इस आसान स्टेप का प्रयोग भी कर सकते हैं। पहले browser > Help > About Google Chrome में जाकर पता कर सकते हैं।



सोर्स:इंडिया.कॉम 
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कई लोगों को भूत के नाम से ही डर के मारे पसीने छूटने लगते हैं, लेकिन अगर कभी अचानक आपके सामने भूत आ जाए तो आप क्या करेंगे? आइए आपको आज हम एक ऐसी घटना के बारे में बताते हैं जहां पर भूत सच में ही टीवी से निकल कर लोगों के सामने आ गया। इस भूत को देख लोग इतने दहशत में आ गए हैं कि वह बेतहाशा इधर-उधर दौड़ने लगे। यह पूरी घटना एक वीडियो में कैद हुई और अब यह वीडियो सोशल साइट्स पर काफी वायरल हो रहा है।




इस वायरल वीडियो में यह साफ दिखाई दे रहा है कि एक टीवी के स्टोर में लोग सामान देख रहे हैं, और वहां पर मौजूद सारे टीवी चल रहे हैं। टीवी पर रिंग्स की सीरिज चल रही है और लोग टीवी देख रहें हैं। इतने में एक टीवी से चुड़ैल बाहर निकलकर आती है। यह चुड़ैल टीवी से इस तरह निकल रही है, जिसे देखकर स्टोर में मौजूद सभी लोग पागल हो गए और तेजी से चिल्लाने लगे।




हम आपको बता दें कि टीवी से निकलती हुई यह चुड़ैल एक प्रैंक वीडियों है। यह प्रैंक कुछ दिनों में रिलीज होने वाली फिल्म द रिंग्स को प्रमोट करने के लिए किया गया था। 2002 में आई फिल्म द रिंग का सीक्वल आने वाला है। फिल्म को प्रमोट करने के लिए निर्माताओं ने लोगों के साथ यह शरारत करने की सोची।







अब यह वीडियो वायरल हो चुका है और दो दिन में ही कम से कम 57 लाख लोग इस वीडियो को शेयर कर चुके थे। इस वीडियो को 54 करोड़ से भी ज्यादा लोग देख चुकें हैं। 8 लाख से अधिक लोगों ने इस वीडियों पर कमेंट किया है, यह वीडियों काफी तेजी से इन दिनों सोशल साइट्स पर वायरल हो रही हैं।









सोर्स:वाह गज़ब 
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दुनिया में दो  प्रकार के लोगों होते हैं। एक वो है, जो बहुत कुछ  होते हुऐ भी  सब कुछ पाने ने के लिए परेशान रहते है , और दूसरे वे जो थोड़े के साथ ही  शांति और खुशाल जीवन का आनंद लेते  है । यह कहानी  एक  खुशाल  कोलम्बियाई जोड़ी की है , जो एक सीवर में रहता है। सभी तरह के  सांसारिक सुख या लक्जरी से दूर लेकिन अपने जीवन से संतुष्ट और खुश । 






कभी जो दो जिंदगियां अपनी जिंदगी को ही खत्म करने निकली थीं, आज वो एक-दूसरे के हमसफर हैं। यह विश्वास करना मुश्किल है, लेकिन मारिया गार्सिया और उसके पति मिगुएल रेस्ट्रेपो पिछले 22 वर्षों के लिए एक सीवर के अंदर रह रहे हैं। लेकिन ऐसा क्या हुआ कि इन्हें सीवर में अपनी जिन्दगी गुजारनी पड़ रही है। इनकी यही कहानी दिलचस्प और दिल को छूने वाली है।



मारिया गार्सिया और उनके पति मिगुएल रेस्ट्रेपो की लव स्टोरी की शुरुआत होती है कोलम्बिया की राजधानी मेडेलिन की सड़कों से, जहां इन दोनों की पहली मुलाकात हुई थी। दोनों की स्थितियां एक जैसी थी। नशे की लत का शिकार हो चुके दोनों अपनी जिंदगी खत्म कर लेना चाहते थे, जब वे कोलंबिया के मेडेलिन में मिले । यह क्षेत्र बेहद हिंसा और नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए जाना जाता है।






वे सड़कों पर रहते थे और नशीली दवाओं की लत उनके  जीवन को बर्बाद कर रही थी ।


इस मुश्किल भरे वक्त में  मिले एक दूसरे के साथ ने दोनों को जीने की एक नयी वजह दी और दोनों ने  नशे की  लत छोड़ने और नए सिरे से एक नयी जिंदगी जीने का फैसला लिया ।


इन दोनों के पास रहने का कोई ठिकाना नहीं था। शादी करने के बाद दोनों ने मेडेलिन की सड़कों पर ही रहना शुरू कर दिया। जिस इलाके में यह रहते थे, वह जगह बड़े पैमाने पर नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए जानी जाती है। बाद में ऐसे माहौल से दूरी बनाने के लिए उन्होंने एक सीवर (नाले) में पनाह ली।






यहाँ पर वे नशे के कुचक्र से बाहर निकले और अपने  जीवन को एक नई दिशा दी और एक दूसरे के लिए अपने प्यार को और मजबूत किया ।


गरीबी की मार झेल रहे इस परिवार ने 22 सालों से नाले में ही अपना आशियाना बनाया है।, और इसे छोड़ने का कोई इरादा नहीं है।






इस आशियाने पर जब आप नजर डालेंगे तो आपको इनके रिश्ते की खूबसूरती का अंदाज होगा। इस घर में वो तमाम सुविधाएं मौजूद है जो किसी भी आम घर में होती है।





यहां पर बिजली आती है। सीवर के अंदर ही किचन भी बनाया गया है साथ ही एक तरफ टीवी भी रखा हुआ है।






इस जोड़े के पास एक प्यारा सा ब्लैकी नाम का कुत्ता है, जो इनके इस प्यारे से आशियाने की रखवाली करता है और घर का साजो सामान लाने में मदद करता है।






इस दंपत्ति को अपनी जिंदगी में अभी तक जो कुछ भी मिला है, वे उससे बेहद खुश हैं। दंपत्ति का कहना है कि अगर अब उनके पास पैसा भी आ जाता है तो वे अपना घर बनाने की बजाए सीवर में बने अपने आशियाने में ही रहना पसंद करेंगे।

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लाखों लोगों से ऑनलाइन बिजनेस के नाम पर 3700 करोड़ की ठगी करने वाले गिरोह के संचालकों की गिरफ्तारी के बाद गाजियाबाद शहर के हजारों लोगों के करोड़ों रुपये दांव पर लग गए हैं। 



लोगों को डर सता रहा है कि उनके रुपये डूब न जाएं। बृहस्पतिवार को ऑनलाइन कंपनी में पैसे लगाने वाले लोग आरडीसी स्थित कंपनी के आॉफिस के बाहर चक्कर लगाते नजर आए। हालांकि कंपनी का ऑफिस बंद मिला।





सूत्रों के मुताबिक, इस ऑनलाइन सोशल ट्रेडिंग कंपनी का मेन सर्वर गाजियाबाद स्थित आरडीसी में ही था, जहां बुधवार दोपहर करीब दो बजे एसटीएफ ने छापा मारा था। कुछ कर्मचारी तो मौके से भाग निकले, जबकि कई को एसटीएफ ने पकड़ लिया था। हालांकि इसकी भनक लोकल पुलिस को नहीं लगने दी गई।



 बृहस्पतिवार को जैसे ही कंपनी कर्मियों के नोएडा में गिरफ्तार किए जाने की सूचना सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों के जरिए मिली तो निवेशकों में खलबली मच गई। लोग लगातार आरडीसी कंपनी के ऑफिस आने लगे।






कुछ तो रजिस्ट्रेशन कराने आए थे, जिनका कहना था कि ईश्वर की कृपा से वे बच गए। वहीं, कई निवेशकों का कहना था कि उन्होंने हाल ही में निवेश किया था, अब उन्हें पैसे डूबने का डर सता रहा है, हालांकि उन्हें मैसेज के जरिए कंपनी कर्मी सूचना दे रहे हैं कि उनके पैसे नहीं डूबेंगे। 



कई ऐसे भी थे, जो कह रहे थे कि उन्हें पैसे लगाने से फायदा हुआ है क्योंकि उन्होंने कई महीने पहले पैसे लगाए थे।




नेहरू नगर निवासी रोहित ने बताया कि उन्होंने ऑनलाइन लाइक करने वाले इस बिजनेस में 57500 रुपये लगाए थे। इसके बाद उनके अकाउंट में प्रतिदिन के हिसाब से करीब 500 रुपये आने शुरू हो गए। इसी कारण उन्होंने अपने रिश्तेदार दोस्तों के रुपये लगवा दिए। 



बृहस्पतिवार को पता चला कि कंपनी को चलाने वाले व्यक्ति को एसटीएफ ने गिरफ्तार कर लिया है। ऐसे अब उन्हें रुपयों की चिंता होने लगी है कि उनके रुपये कैसे आएंगे।




ऐसे चलता था धंधा

इस ऑनलाइन बिजनेस में 5750 रुपये लेकर 57500 रुपये तक रजिस्ट्रेशन शुल्क लिया जाता था। रकम के हिसाब से ही बिजनेस मिलता था। 57500 रुपये के निवेश पर प्रतिदिन 120 ऑनलाइन एड देखकर उन्हें लाइक करना होता था। प्रति लाइक के पांच रुपये मिलते थे।


 यह बिजनेस महीने में 20 दिन करना होता था। प्रतिदिन 510 रुपये अकाउंट में जमा हो जाते थे। यही नहीं, दूसरे किसी व्यक्ति को इस कंपनी से जोड़ने पर प्रोत्साहन राशि भी मिलती थी।



 सूत्रों के मुताबिक, इस तरह की कई और कंपनियां भी गाजियाबाद में चल रही हैं, जो लोगों से इसी तरह निवेश कराती हैं। अब इन कंपनियों में निवेश करने वालों में भी बेचैनी बढ़ गई है।



सोर्स:अमरउजाला 
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पुलिस से न दोस्ती भली, न दुश्मनी. उससे दूर रहने में ही भलाई है. ऐसी समझदार लागों की सीख है. तुलसीदास होते तो लिखते – पुलिस नाम का भय जो दिखावे, भूत पिशाच निकट नहीं आवे. लेकिन राजस्थान के शाहपुर में एक थाना है जहां की पुलिस को अपना भय भगाने के लिए नींबू-मिर्ची का टोटका करना पड़ रहा है.


 पुलिस को डर है कि थाने पर बुरी नज़र को न भगाया गया तो पास के दिल्ली-जयपुर हाईवे पर हादसे नहीं रुकेंगे. तो इसका तोड़ ये निकाला गया कि थाने में ड्यूटी अफसर की कुर्सी के ऊपर रोज़ नींबू-मिर्ची का टोटका लटकाया जाए.



नींबू-मिर्ची के टोटके में एक काले धागे में कुछ हरी मिर्चियां और एक नींबू पिरो कर कहीं टांग दिया जाता है. लोग अकसर इसे अपने घरों या दुकानों के बाहर टांगते हैं. लोगों के बीच इस तरह का अंधविश्वास पसरा हुआ है कि इससे वो बुरी नज़र से बचे रहेंगे.


फोटोः केचप ब्लॉग


एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-जयपुर हाईवे पर 2016 के नवंबर महीने में 19 हादसे हुए जिनमें 10 लोगों की जान गई. इसके बाद दिसंबर महीने में 14 हादसे हुए और 6 लोगों की मौत हुई. थाना इंचार्ज वीरेंद्रसिंह राठौड़ का कहना है कि हादसों से परेशान होकर बड़े बुज़ु्र्गों से सलाह की गई. 




फिर थाने में बने भैंरूबाबा मंदिर को सामने रखे कबाड़ वाहन हटाए गए (थानों में अकसर ऐसी गाड़ियों का अंबार लगा रहता है जो किसी मामले के चलते थाने में लाई जाती हैं लेकिन उनके मालिक उन्हें छुड़ा कर नहीं ले जाते). इसके अलावा थाने में ड्यूटी अफसर की कुर्सी के उपर रोज़ नींबू-मिर्च लटकाना शुरू किया गया. दावा किया गया है कि इसके बाद हादसे कम हुए हैं. बताया गया है कि जनवरी के पहले 15 दिनों में किसी हादसे की खबर नहीं आई.



हमें इन पुलिसवालों को ज्ञान देने की कोई इच्छा नहीं है. नींबू-मिर्च के मामले में. हम इस आदत को समझना चाहते हैं जो भारत में करोड़ों लोगों को है. ये पुलिस वाले भी उसी समाज से आते हैं जहां से बाकी सब लोग. वे पुलिस में भर्ती होते हैं तो अपने धार्मिक, जातीय, शैक्षणिक बैकग्राउंड के साथ. वे उसे कभी पीछे नहीं छोड़ते. 



पुलिसकर्मी के तौर पर वे जो भी फैसले लेते हैं तो अपने पिछले ज्ञान और फेथ के हिसाब से. कहने को पुलिस की रूल-बुक होती है लेकिन ये घटना दिखाती है कि पुलिस कर्मियों के फैसलों में उनके धार्मिक पूर्वाग्रह भी काम करते ही हैं. उनके ही नहीं पत्रकारों के, न्यायविदों के, प्रधान मंत्रियों के और राष्ट्रपतियों के भी करते हैं.




हम देखते हैं कि ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर काम फेथ से होता है, तर्क से नहीं. और ये सदियों से होता आया है. लोगों ने देवी-देवताओं को सवा रुपये के प्रसाद बोलकर पूरी जिंदगी अपनी मुश्किलों को पार किया है. या कम से कम उन्हें एेसा लगा कि उस प्रसाद से वो मुश्किलें पार हुईं.



इस मामले में ये कहना बहुत आसान है और व्यर्थ भी कि वो एक्सीडेंट नींबू-मिर्ची लगाने से नहीं रुके. हमारे मुताबिक ये महज एक संयोग था. एक्सीडेंट सही ट्रैफिक नियम और सड़क व्यवस्था से रुकते हैं. लेकिन जब तक उस रोड़ पर प्रशासन की एेसी दृष्टि हो तब तक कौतूहल मन में होता है कि आखिर क्यों शनिवार और मंगलवार को भारत के ज्यादातर इलाकों में दुकानदार और अन्य प्रतिष्ठानों के लोग मिर्ची-नींबू लगाते हैं? और एेसा वो करते हैं जो पढ़े-लिखे, विज्ञान में भरोसा करने वाले लोग होते हैं.




इस विषय पर आप क्या सोचते हैं बताएं. कमेंट में अपनी सोच शेयर करें.




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सुबह देर तक सोना किसे अच्छा नहीं लगता? अक्सर हममें से कइयों ने रात को देर से सोने और सुबह को देर से उठने के लिए कभी न कभी डांट तो खाई ही होगी। 




लेकिन अब हम आपको जो कुछ बताने जा रहे हैं उसे सुनकर यकीनन आपको अपनी इस आदत पर नाज होगा। चेहरे पर मुस्कान भी आएगी।


इस रिपोर्ट के मुताबिक, साउथम्प्टन विश्वविद्यालय ने हाल ही में किए गए अपने शोध में कहा है कि देर से सोने वाले और देर से उठने वाले लोग दूसरों से अधिक क्रिएटिव और समझदार होते हैं।



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Giphy


इस शोध में 1229 लोगों को शामिल किया गया था, जिसमें महिला-पुरुष दोनों शामिल थे। शोध का जो परिणाम आया वह चौकाने वाला रहा।  


नतीजे में सामने आया कि जो लोग रात 11 बजे के बाद सोते हैं और सुबह 8 बजे के बाद उठते हैं, वे जल्दी उठने वालों की तुलना में अधिक पैसे कमाते हैं और सामान्य तौर पर वे आरामदायक जीवन शैली बिताते हैं ।



अपने इस शोध का तर्क देते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर कोई सो रहा है और अलार्म को बार-बार स्नूज़ पर डाल रहा है, तो यह इस बात की ओर संकेत करता है कि उस शख्स का दिमाग कुछ सोच रहा है, जिसे थोड़ा और वक़्त चाहिए।



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आगे की रिसर्च में कहा गया है कि जो लोग हर सुबह स्नूज़ बटन का इस्तेमाल करते हैं वे नई आधुनिक, किसी भी शैली में खुद को ढाल पाने में सक्षम होते हैं। साथ ही अपनी समस्याओं का ढिंढोरा पीटने की बजाय, उसका समाधान निकालने की कवायद में लग जाते हैं।



इस रिसर्च ने कई सदियों से चली आ रही उस सोच को चुनौती दी है, जो कहती है कि जो लोग देर से सोते या फिर देर से उठते हैं वे आलसी होते हैं।


 तो बस अब जो कोई भी आपको आलसी कहता है, उसे ये पोस्ट दिखाए, और बताए आप आलसी नहीं, बल्कि क्रिएटिव हैं जनाब। 😂😃


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