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The fascinating story of India's first war of independence 1857The fascinating story of India's first war of independence 1857



1857 की क्रांति ने भारत के इतिहास में एक नया कैलेंडर बना दिया. उस साल भारत एक देश की तरह पहली बार खड़ा हुआ था. जबरदस्त लड़ाई हुई, पर ब्रिटिश विजयी रहे थे. देश के बहुत सारे राजाओं ने अंग्रेजों का ही साथ दिया था. बहुत हिचक रहे थे. और बहुतों ने उनके खिलाफ लड़ते हुए जान दी. कुछ तो हारने की टीस, कुछ पुराने सिस्टम को गंवाने का दुःख, ये सब मिलकर कई कहानियां गढ़ गए. वहीं जीती हुई ब्रिटिश सेना ने अलग इतिहास लिख दिया. इस क्रांति के बारे में कई तरह की कहानियां बन गईं. जीते हुए लोगों की गायी गई कहानियां और हारे लोगों की कही गयी कहानियां.


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आइये पढ़ते हैं 1857 के बारे में कुछ बातें:

1. शायर बादशाह लड़ा और इतनी रानियां लड़ीं कि किसी देश में इसकी मिसाल नहीं मिलती



भारत के बारे में हमेशा कहा जाता था कि यहां के लोग राजनीति में ज्यादा चूं-चपड़ नहीं करते थे. ‘कोऊ नृप होए, हमें का हानि.’ कोई भी आ के राजा बन गया, जनता को कोई दिक्कत नहीं थी. पर 1857 में पहली बार सैनिकों के अलावा व्यापारी, किसान और साधु तक लड़े थे.


लड़ने वाले राजा कई तरह के स्वभाव और बैकग्राउंड वाले थे. ‘शायर’ बादशाह बहादुर शाह जफ़र को सबका नेता बनाया गया था. पेशवा बाजीराव द्वितीय के गोद लिए हुए नाना साहब, 80 साल के बूढ़े कुंवर सिंह, तांत्या टोपे और बख्त खान भी हर जगह से लड़ रहे थे. फिर रानी लक्ष्मीबाई जो बेटे को पीठ पर बांधकर लड़ती थीं. बेगम हज़रत महल, रानी ईश्वरी देवी, तुलसीपुर की रानी सबने भयानक लड़ाई लड़ी थी. इतनी रानियों का जंग करना किसी भी देश के इतिहास में पहला मौका था.

रानी लक्ष्मीबाई और बेगम हज़रत महल


ब्रिटिश अफसर ह्यू रोज ने कहा था: सारे विद्रोहियों में रानी लक्ष्मीबाई ही लड़ाका थी. सारे विद्रोहियों में अकेली ‘मर्द’. रानी लक्ष्मीबाई के साथ ही उनकी बचपन की सखी झलकारीबाई का भी नाम आता है. वो दलित समुदाय से आती थीं. उन्होंने लक्ष्मीबाई के लिए अपनी जान दे दी थी.


2. आधे देसी राजा अंग्रेजों की तरफ थे, वहीं कुछ अंग्रेज भारत की तरफ से लड़े



लड़ाई अपने तय समय से पहले शुरू हो गयी थी. क्योंकि मंगल पाण्डेय ने कारतूस में चर्बी के नाम पर अपने एक अफसर को मार दिया था. सैनिक वहीं से विद्रोह कर गए. जब बहादुरशाह जफ़र को  बताया गया कि विद्रोही आप को नेता बनाना चाहते हैं तो वो घबरा गए. उनको किसी पर भरोसा नहीं था.  वो पहले से ही अंग्रेजों के पेंशनर थे. अपने बारे में चिंतित हो गए. साम्राज्य तो था नहीं. पर जब विद्रोही उनके पास पहुंचे तो वो नेता बनने के लिए तैयार हो गए. उनका नेता बनना महज एक सिंबल था. *इसके पहले जफ़र ने आगरा के लेफ्टिनेंट गवर्नर को विद्रोहियों के बारे में खबर कर दी थी. ऐसे ही रानी लक्ष्मीबाई ने पेशकश रखी थी कि मेरा राज्य छोड़ दो तो मैं तुम्हारी मदद करूंगी. पर अंग्रेजों ने मना कर दिया. उसी तरह कुंवर सिंह की मांग भी अंग्रेजों ने मना कर दी थी. पर सारे राजा नहीं लड़े थे. बंगाल से दिल्ली तक की सीधी पट्टी के राजाओं ने ही लड़ाई लड़ी. पंजाब के राजाओं ने अंग्रेजों की मदद की. दक्षिण भारत के राजा एकदम शांत रहे. जैसे कुछ हुआ ही नहीं था.

Indian States During Revolt Of 1857
लड़ाई के वक़्त रियासतों की स्थिति (सोशल मीडिया से)


सबसे मजेदार बात है कि कुछ अंग्रेज भारत की तरफ से लड़े थे. सार्जेंट मेजर गॉर्डन, जिनको हिन्दुस्तानी शेख अब्दुल्ला बेग कहते थे, लखनऊ से लड़े थे. बहुत सारे एंग्लो-इंडियन सैनिक भी लड़े थे. पर सारे लोग मारे गए.
*बहादुरशाह जफ़र को रंगून भेज दिया गया. उनके बेटों को क़त्ल कर दिया गया. उनके छोटे बेटे को उनके साथ रंगून भेज दिया गया था.  रंगून में ही मरने से पहले बहादुरशाह जफ़र ने ये शेर लिखा था:


कितना है बदनसीब ‘ज़फर’ दफ़न के लिए,
दो गज ज़मीन भी ना मिली कू-ए-यार में.


बहादुरशाह जफ़रबहादुरशाह जफ़र

एक और शायर हुए रहे उस बखत. चाचा ग़ालिब. दिल्ली से कलकत्ता तक सबसे उधार लिए रहे. अंग्रेजन के पास जा हाजिरी देते रहे. शायर आदमी थे, कहां लड़ते. पर लिखा जरूर था:

अल्लाह! अल्लाह! दिल्ली न रही, छावनी है,
ना किला न शहर ना बाज़ार ना नहर,
क़िस्सा मुख़्तसर, सहरा सहरा हो गया.



3. अंग्रेज मानते नहीं, पर रोटी से ही फोन का काम लिया गया था



ऐसा कहा जाता है कि विद्रोह की बात सब तक पहुँचाने के लिए कोई जरिया नहीं था. तो रोटी के सहारे सन्देश पहुंचाए जाते थे. एक रोटी किसी के पास पहुँचती थी. उस आदमी को सारा मामला समझाया जाता था. फिर वो वैसी ही बहुत सारी रोटियां बनाकर सबको बताता था. क्योंकि अंग्रेजों को पता चल जाता तो भांडा फूट जाता. रोटी घुमाने का कोई प्रमाण तो नहीं है क्योंकि छुप-छुपा के काम हो रहा था. पर एक ब्रिटिश डॉक्टर गिल्बर्ट हडो ने अपनी बहन को चिट्ठी लिख इस बारे में बताया था. अंग्रेज इतिहासकार इस बात को नकार देते हैं. क्योंकि बेइज्जत होने का डर था. कि सामने ही रोटी रख के सारा मामला हो गया और हवा तक नहीं लगी.

उस समय के बम्बई के पास अलीबाग के विष्णु भट्ट गोडसे वरसाईकर ने इस विद्रोह के बारे में किताब लिखी थी: A Factual Account of the 1857 Mutiny. उस समय ये पब्लिश नहीं हो पाई. हुई 1907 में. एक आम आदमी की नजर से विद्रोह के बारे में ये बहुत ही जबरदस्त ढंग से लिखी किताब है. पढ़ते-पढ़ते आप रोने लगेंगे.


4. हिटलर से ज्यादा खून बहाया अंग्रेजों ने, हिन्दू-मुसलमान को तोड़ना शुरू कर दिया



हिन्दू-मुसलमान दोनों ने मिलकर लड़ाई लड़ी थी. ‘हर-हर महादेव’ के साथ ‘अल्लाह-हो-अकबर’ के नारे गूंजते थे. इस बात से अंग्रेज घबरा गए थे. लड़ाई ख़त्म होने के बाद इसका उपाय किया गया. दिल्ली में पकड़े गए हिन्दू सैनिकों को छोड़ दिया गया. कहते हैं कि दिल्ली में एक ही दिन 22 हज़ार मुसलमान सैनिकों को फांसी दे दी गयी. यही तरीका कई जगह आजमाया गया. फिर हिन्दुओं को सरकारी नौकरी और ऊंचे पद दिए जाने लगे. मुसलमानों को दूर ही रखा गया. धीरे-धीरे जनता में हिन्दू-मुसलमान की भावना फैलने लगी. इसके ठीक बीस साल बाद पॉलिसी बदल दी गयी. अब मुसलमानों को ऊंचे पदों पर बैठाया जाने लगा. और हिन्दुओं को प्रताड़ित किया जाने लगा.

1857 की क्रांति के बाद ऐसे ही हुई थी फांसियां1857 की क्रांति के बाद ऐसे ही हुई थी फांसियां

ऐसा कहा जाता है कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद लगभग 10 लाख हिन्दुस्तानियों को मारा गया. दस साल तक ये काम गुपचुप रूप से किया जाता रहा. एक पूरी पीढ़ी को खड़ा होने से रोक दिया गया. हालांकि ब्रिटिश इस बात को नकार देते हैं. पर रिसर्च करने वाले कहते हैं कि नकारने से सच झुठलाया नहीं जा सकता. हिटलर ने भी यहूदियों के साथ इतना खून-खराबा नहीं किया था.


5. क्या होता अगर देसी राजा जीत गए होते?



ये सवाल बार-बार उठता है. क्योंकि देसी राजा उस समय पुराने ज़माने के हिसाब से चलते थे. आधुनिकता से कोई लेना-देना नहीं था. डेमोक्रेसी आने की कोई संभावना नहीं थी. फिर देश में कोई बड़ा शासक नहीं था. पूरा देश रियासतों में बंटा पड़ा था. शायद सूडान या मिडिल ईस्ट जैसी स्थिति हो जाती. पर ये भी संभव था कि जिस अंदाज में राजा और रानियां लड़े थे, देश अपने आप आधुनिकता के रास्ते चल पड़ता. फिर अंग्रेजों के हाथ से इंडिया के निकल जाने से दुनिया में उनका वर्चस्व कम हो जाता. इंडिया के दम पर उन्होंने बहुत कुछ हथियाया था.

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !


*बिपिन चंद्रा की किताब India’s Struggle For Independence से


**इतिहास में किसी बादशाह या किसी रानी-राजा ने जो भी फैसले लिए, वो उस वक़्त की स्थितियों और समझ के मुताबिक थे. आज के डेमोक्रेटिक मूल्यों के आधार पर हम उन फैसलों को तौल नहीं सकते. क्योंकि ये सही नहीं होगा. उन फैसलों के बारे में कोई भी बात, किसी को भी ‘देशद्रोही’ साबित करने का जरिया नहीं हो सकती. इतिहास को कभी वर्तमान के चश्मे से नहीं देखना है. जो था, वो था.


*** भूल सुधार: एक अन्य लड़ाई में शाह आलम द्वितीय को अंधा किया गया था. यहां पर बहादुरशाह जफ़र के बारे में ऐसा लिखा गया था. इसके लिए खेद है.



सोर्स:लल्लनटॉप
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वर्ल्ड कप 2011. फाइनल. वानखेड़े स्टेडियम. इंडिया वर्सेज़ श्री लंका. 19वां ओवर. मुरलीधरन का पहला ओवर. दूसरी गेंद. बैक फुट पर पॉइंट के सामने पंच. बैट्समेन दौड़ कर जल्दी से उस पार पहुंच जाना चाह रहा था. उधर पहुंचा तो मन बना लिया कि दूसरा रन भी लेना है. दौड़ पड़ा. साथी रनर कोहली था. तेज़. वो भी दौड़ पड़ा. उधर डीप से थ्रो आया. बैट्समैन अभी आधी ही पिच पर था. गेंद हवा में ही थी कि उसने छलांग लगा दी. क्रीज़ में बल्ला लेके कूद पड़ा. ऐसे, जैसे जीवन-मौत का सवाल था. क्रीज़ में बल्ला जाते ही ज़मीन में घिस गया. थ्रो कीपर के सामने पड़ा. गेंद हल्की सी अजीब ढंग से हवा में उठ गयी. कीपर ने गेंद कलेक्ट की. लेकिन तब तक बैट्समैन वापस पहुंच चुका था. अभी भी घिसट ही रहा था. धूल के एक गुबार के बीच. उसने कूदते वक़्त अपनी पूरी ताक़त झोंक दी थी. उसे अपने विकेट की अहमियत मालूम थी. वो इतनी ज़ोर से आगे की ओर कूदा था कि उसके शरीर का पिछला हिस्सा हवा में उठ गया. दोनों टांगें ग्रेविटी को झूठा बता रही थीं. और ठीक उसी वक़्त गंभीर एक बिच्छू की तरह लगने लगे थे. वो बिच्छू जिसका डंक हवा में तना खड़ा है. चोट को तैयार. बैट्समैन खड़ा हुआ तो कमीज़ सन चुकी थी. चीकट एकदम. लेकिन उसे इस बात का गम नहीं था. वो खिलाड़ी था. और एक खिलाड़ी के लिए वो चीकट हो चुकी कमीज़ गहने से कम नहीं होती.



उस रात टूर्नामेंट ख़तम हुआ. उस रात की दो अहम तस्वीरें. सचिन का कोहली के कंधे पर बैठ ग्राउंड का चक्कर लगाते हुए और धोनी के मारे आखिरी छक्के की तस्वीर. एक तस्वीर जो मुझे जितना कचोटती है उतना ही सुकून भी देती है. वो तस्वीर जिसके बारे में सबसे कम बात की जाती है. गंभीर के आउट होने पर जाते वक़्त उनकी हेल्मेट उछालते हुए जाने की तस्वीर. उसके पहले आउट होते ही उनके हाथ हवा में उठ गए. बल्ला उठाये हुए. जैसे एक बहुत बड़ा काम पूरा हुआ हो. 122 गेंदों पर 97 रन. वो 97 रन जिन्होंने आधा वर्ल्ड कप जिताया था. एक चौथाई धोनी और बचा-खुचा बाकी टीम ने. और यही एक बात गंभीर को हमेशा से खाती आई है. उसे वो हक़ नहीं मिला जिसका वो हक़दार रहा. उसने कुछ काम किया, मगर ट्रॉफी उसे मिली, जिसके काम में ज़्यादा चमक-दमक रही.



ये 97 रन बहुत काम के थे. और जिस तरह से गंभीर आउट हुए थे, उनकी ईमानदारी और टीम के लिए खेलने की आदत मालूम चल रही थी. 54 गेंद में 52 रन चाहिए थे. टार्गेट एक गेंद पर एक रन का होने ही वाला था. सामने परेरा था. स्लो पेसर. गंभीर को पैरों का इस्तेमाल करना बेहद पसंद है. परेरा पर निकल पड़े. बिना ये सोचे कि खुद की सेंचुरी होने वाली है. मात्र 3 रन दूर. बिना ये सोचे कि वर्ल्ड कप में चेज़ करते हुए सेंचुरी मारना तोप चलाने से भी मजबूत काम होता है, जिसे वो करने वाले थे. बिना ये सोचे कि ऐसा करने वाले वो पहले बल्लेबाज बन जायेंगे. लेग साइड में रूम बनाकर डाउन द पिच आये. स्लॉग किया और मिस कर गए. मिडल स्टम्प अपनी जगह से हिल गया. वानखेडे में शांति छा गयी. और फिर अगले ही पल वहां तालियों का शोर भर गया. गंभीर के लिए हर कोई खुश था. लोगों के पास उन्हें शुक्रिया कहने को ताली पीटने के सिवा और कुछ नहीं था. मैन ऑफ़ द मैच धोनी को मिला. तस्वीर धोनी की छपी. कंधे पर सचिन चढ़े.



साल 2007. जोहांसबर्ग. साउथ अफ़्रीका. वर्ल्ड टी-20 फाइनल. इंडिया वर्सेज़ पाकिस्तान. गौतम गंभीर ओपेनिंग के लिए आये. साथ में यूसुफ पठान. एक एंड पर बैट्समैन आ रहे थे, जा रहे थे. दूसरे एंड पर गौतम गंभीर सब कुछ खड़े देख रहे थे. मानो साक्षात संजय हों. ये मार भी रहे थे. संजय बस आंखों देखा हाल सुना रहे थे. गंभीर ने आउट होने के वक़्त 54 गेंदों पर 75 रन बनाये. टीम का स्कोर था 130 पर 5 विकेट. 7 बल्लेबाजों में गंभीर का हिस्सा 57%. बाकी के बल्लेबाजों का स्कोर था 15, 8, 14, 6, 6*


ऐसे में इंडिया के लिए गंभीर वो बने जिसने मझदार में फंसी कश्ती निकाल किनारे लगा दी. दो ओवर बाद इंडिया की इनिंग्स खतम हो गयी. कुल स्कोर 157 पर 5. अगली इनिंग्स में दो तस्वीरें फिर से चलीं. आख़िरी शॉट पर जोगिंदर शर्मा की गेंद पर कैच लेता श्रीसंत और खुशी में चिल्लाते धोनी. गंभीर एक बार फिर से पार्श्व में.



गौतम गंभीर. यानी भयानक तरीके से जूझ के खेलने वाला क्रिकेटर. बचपन में एक खिलौना देखा था. कित्ता भी मारो, वो गिरता नहीं था. उसके तले में सरसों के दाने भरे रहते थे. गंभीर भी वही खिलौना है. कितने भी मुक्के बरसाओ, नहीं गिरता था. दोबारा उठा खड़ा होता था. हाल ही में गंभीर को टेस्ट टीम में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ़ देखना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. हाल ये था कि लगभग महीने भर पहले गंभीर को टीम में देखने का सवाल भी मन में आता था तो हंसी आती थी. लेकिन दिलीप ट्रॉफी में जिस तरह से रन बनाये, उन्हें बाहर रखना बेहद मुश्किल था.


इसके साथ ही उनकी ढीठ होने की फितरत. फिर सामने चाहे ऑस्ट्रेलिया हो चाहे पाकिस्तान. वॉटसन ने ज़्यादा खिट-खिट की तो दौड़ते वक़्त उसे कुहनी मार दी. बैन लग गया. लेकिन हां, हमेशा ही बदतमीज़ रहे ऑस्ट्रेलियन खिलाड़ियों को एक ये इशारा ज़रूर गया कि उनके सामने खड़े होकर उतनी ही बदतमीज़ी से जवाब देने वाला कोई माई का लाल आ गया है. कानपुर में कम से कम सवा किलो गालियां तौल के अफ़रीदी के मुंह पर मारने वाला गौतम गंभीर. कामरान अकमल के मुंह पर जाकर उसे औकात दिखाने वाला गौतम गंभीर.


हालांकि उनके टेम्परामेंट से दिक्कतें तो रही हैं. फिर वो चाहे आईपीएल में कोहली से हुई गाली-गलौज हो, या आईपीएल में ही बैंगलोर के खिलाफ़ जीतने की हालत में पहुंचने पर उचारी गई गालियां और कुर्सी को मारी लात भी एक मुद्दा है. लेकिन ठीक है. घर का कमाऊ बेटा हो तो चार ऐब भी समझ लिए जाते हैं.


खैर, गौतम गंभीर. यानी बिच्छू. यानी वो खिलौना जिसको कितना भी मारो, उठ खड़ा होता है. जितना भी उकसाओ, उतना उल्टा काटने को दौड़ता है. जिसको पैरों का इस्तेमाल करना बहुत पसंद है. जो टीम के लिए खेला. जिसे उतनी लाइमलाइट नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी. जिसका रंज उसे हमेशा रहेगा. शायद.




सोर्स:लल्लनटॉप

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रविवार एक ऐसा दिन जिसका इन्तजार हर किसी को रहता है। यही वो दिन है, जिसमें एक इंसान को अपने परिवार और दोस्तों के साथ वक्त बिताने का पूरा समय मिलता है।


जरा सोचिए अगर रविवार की छुट्टी नहीं होती, तो क्या होता, क्योंकि यही एक दिन ऐसा होता है जब काम की भागदौड़ से, पूरे हफ्ते में से एक दिन की छुट्टी नसीब होती है। रविवार की छुट्टी हमें यूं ही आसानी से नहीं मिली, इसके पीछे किसी के संघर्ष की गाथा जुड़ी है।


जिस तरह से ब्रिटिश हुकूमत की जंजीरों से आजादी पाने के लिए हमने संघर्ष किया, उसी तरह हमें सप्ताह में एक दिन की छुट्टी के लिए भी काफी संघर्ष करना पड़ा था।


रविवार की छुट्टी कोई एक दिन में घोषित नहीं कर दी गई थी। आठ साल की लंबी लड़ाई के बाद हमें रविवार की छुट्टी नसीब हुई थी।


जब भारत ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, उस समय इस देश के मजदूर हर दिन काम किया करते थे, कपड़ा और दूसरे तरह की मिलों में काम करने वाले इन मजदूरों को एक दिन का भी आराम नहीं दिया जाता था।

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उस समय मजदूरों के नेता हुए करते थे श्री नारायण मेघाजी लोखंडे, जिन्होंने अपनी आवाज बुलंद कर मजदूरों के हक के लिए आंदोलन छेड़ दिया।


श्रम आंदोलन के जनक कहे जाने वाले लोखंडे ने साल 1881 में ब्रिटिश साम्राज्य के सामने हमारे मजदूरों को सप्ताह में एक दिन की छुट्टी दिए जानी की मांग रखी।

भारत सरकार ने भी नारायण मेघाजी लोखंडे को सम्मान देते हुए 2005 में उनका एक डाक टिकट जारी किया।phila-art



मजदूरों की आवाज बने लोखंडे ने अंग्रेजों से, रविवार को छुट्टी का दिन घोषित करने का अनुरोध किया, क्योंकि रविवार को ही अंग्रेज चर्च जाया करते थे और हिन्दू देवता खंडोबा का भी दिन, रविवार को ही माना जाता है। लेकिन अंग्रेजी अफसर इसके लिए बिलकुल भी तैयार नहीं हुए।


लिहाजा लोखंडे ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल बजा दिया। 1881 से लेकर 1889 तक चले कड़े संघर्ष के बाद आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत को अपने घुटने टेकने पड़े और रविवार को हमेशा के लिए छुट्टी का दिन घोषित कर दिया गया।



साथ ही, वो नारायण मेघाजी लोखंडे ही हैं, जिनकी वजह से दोपहर में काम के दौरान आधे घंटे लंच का समय, हर महीने की 15 तारीख तक वेतन मिलना संभव हो सका।



सोर्स:टॉप-यपस

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हाल-फिलहाल की मंदी छंटने लगी थी. ये साल 2010 था, ख़त्म हो रहा था, उस वक़्त टेक्नोलॉजी का कुछ ऐसा था कि हर हाथ में फोन पहुंच चुका था. ऑरकुट कहीं पीछे छूट चुका था और फेसबुक जॉम्बीलैंड बना था, जहां सब अभुआए फिरते थे, जहां हर रोज एक जान-पहचान वाले की रिक्वेस्ट आती. दिन-ब-दिन नई-नई प्रोफाइलें तैयार हो रहीं थी. ध्यान रहे हम उस दौर की बात कर रहे हैं, जब फेसबुक पर कवर पिक अनिवार्य नहीं हुई थी. जब हर कोई भाजपाई-कांग्रेसी या आपिया नहीं ठहरा दिया जाता था. फेसबुक पर गालियां लिखना बुरा माना जाता था, लोग कमेंट में मेंशन नहीं पोस्ट में टैग किए जाते थे. जब नोटिफिकेशन मिस करना नैतिक अपराध समझा जाता था. ये वो दौर था जब फेसबुक पर मैसेज भेजने के पहले सब्जेक्ट का ऑप्शन भी आता था. फोन छोटे थे, तकनीक सीमित, नेट पैक सस्ते और दोस्तों को गुड मॉर्निंग वाले शेर भेजना अभी भी वक़्त की बर्बादी नहीं माना जाता था.


वो जैसे कहते हैं कि देश बदलाव के दौर से गुजर रहा था. वैसा कुछ न था. बाजार संभल रहा था. ऐसा मुझे लगता है. अन्ना की क्रांति भी अभी तक मार्केट में न धंसी थी. हुआ ये था कि चीजों की स्वीकार्यता बढ़ गई थी, मल्टीमीडिया-GPRS वाले फोन्स के बाद एक्सपोजर भी. कैफे में पड़े कम्प्यूटरों से आगे बढ़ रहे समाज को नई तरह की आजादी महसूस हो रही थी, मेमोरी कार्ड की जरूरत और नेट पैक की अनिवार्यता सिंक्रोनाइजेशन में थे.


कुल जमा सोशल नेट्वर्किंग साइट पर एक बड़े वर्ग का किशोरवय जैसा कुछ चल रहा था. ठीक उसी समय 2010 की सर्दियों में एक कहानी फैलना शुरू हुई. रोहन राठौर की. आईआईटी- गुवाहाटी का लड़का था. एक लड़की सुप्रिया से प्यार करता था. एक दिन उसे पता चला उसे कैंसर है, टर्मिनल कैंसर, जिसमें आदमी बहुत रोज नहीं जीता. इस बीमारी के कारण वो सिर्फ 30 दिन जीने वाला था. उसने सुप्रिया को अपनी बीमारी के बारे में बताया. सुप्रिया उसे छोड़ गई. टूटे दिल से Emptiness गाना निकला. उसने ये गाना गाया और 15 दिन बाद मर गया. इसी कहानी के साथ ये गाना शेयर किया जाता. गाना सुना जाता. डाउनलोड किया जाता. शेयर किया जाता. ये कहानी ऐसे फ़ैल रही थी जैसे कुएं की जगत पर झाड़ फ़ैल जाते हैं.





बाद के किस्से ये भी हैं कि उस लड़की ने गाना सुना , उसे गलती का अहसास हुआ, बदले में उसने लेडीज वर्जन ‘मैंने मेरे जाना’ गाया और सुसाइड कर लिया. इससे सीधी कहानी हेमिंग्वे भी क्या सुनाएंगे?


एक वक़्त था जब यू-ट्यूब पर रोहन राठौर के नाम से इस गाने के 340 वर्जन आ चुके थे. गजेन्द्र वर्मा वाला वर्जन ये रहा.




पर बात यहां इसकी नहीं कि ये झूठ किसने फैलाया. कैसे गजेन्द्र वर्मा ने इसे अपना साबित किया. कैसे उस वक़्त रोहन राठौर के नाम से चलने वाला पेज आज खोलो तो स्लोप अप वेबसाइट का पेज खुलता है. अब क्लिक करने पर यूआरएल www.facebook.com/pages/Emptiness-tune-mere-jaana-Rohan-Rathore/149376318445260 बदलकर www.facebook.com/SlopUp हो जाता है. यहां हम जो बता रहे हैं वो ये कि गाना पूरे एक दौर के भीतर धंस गया. अब तो गाना याद करो तो अपराधबोध और शर्म साथ जुड़ जाते हैं. लेकिन एक सच ये भी है कि गाना अच्छा था.



इसके साथ जो किस्सा जुड़ा था, उसकी वजह से इसने सीधे लोगों को छुआ, उन लोगों तक जिनके हाथ में नई-नई तकनीक आई थी, जिनके लिए अंग्रेजी में लिखी किसी कहानी को समझना तो आसान था लेकिन ये तय करना मुश्किल था कि लिखी हुई चीज सही है या गलत. स्कूल की बड़ी क्लास के बच्चों और ग्रेजुएशन लेवल के लड़कों में इस गाने का बहुत क्रेज था. हर चौथे लड़के की रिंगटोन में यही गाना बजता. फेसबुक पर जाने कितनों के पहले-पहले पेजेज के नाम इसी गाने पर धराए थे. आदमी दो- चार ऐसे ग्रुप में तो जरूर ही रहता था, जिसका नाम Emptiness या तूने मेरे जाना, कभी नहीं जाना हो.


फेसबुक पर फोटोज चलतीं. जूते-जीन्स वाला लड़का मुंडी झुकाए बैठा रहता. पीछे पेंट से इस गाने के लिरिक्स लिखे होते. जाने कितनों ने अपना पहला फेसबुक पोस्ट ही यही डाला होगा. गाने का अंग्रेजी हिस्सा रटा जाता. इलेक्ट्रिकल ब्रांच में तो सात लडकों ने इसे रिंगटोन में लगा रखा था. कुछ के तो अलार्म में भी यही गाना बजा करता. कान में इयरफोन लगा गाना सुना जाता है और बेवजह उदास हो जाते. उस वक़्त लगता था नए जवान हुओं का एक ढेर यही चाहने लगा था कि कोई सुप्रिया उन्हें छोड़ गई है और वो टर्मिनल कैंसर जैसी किसी कूल बीमारी से मरना चाहते हैं.


फेसबुक पर दुखद कहानियों की बाढ़ आ गई थी. कहानी कुछ ऐसे होती कि लड़का लड़की दोस्त थे. लड़का लड़की को प्यार करता पर कभी बता नहीं पाया. लड़की बीमार पड़ी उसको दिल की जरूरत थी. लड़के ने दे दिया. खुद मर गया लड़की बच गई. लड़का मर गया. लड़की को प्यार का पता चला.   या फिर दूसरा किस्सा लड़की-लड़का दोस्त थे. लड़का एक दिन गायब हुआ. कुछ दिन बाद लड़की को खत मिला. लड़के ने लिखा था उसे कोई ऐसी बीमारी थी जिसके चलते वो बच नहीं सकता था, लड़की दुखी हो जाती, इसलिए तब नहीं बताया. अब उसके मरने पर चिट्ठी आई. माने इमोशनल फूल बनने का दौर चल रहा था. याद रहे कि ऐसी तमाम कहानियां इसी गाने से जुड़े पेज और ग्रुप्स पर नजर आतीं.


दिल को भेदने वाली प्रेम कहानियां भी आने लगी थीं उस दौर में. एक कहानी में तो लड़का अंधी लड़की से प्यार करता है. और इतना ज़्यादा करता है कि लड़की को बिना बताए अपनी आंखे निकलवा के दे देता है. अब लड़की को दिखाई देने लगता है. और मैडम अपने बरसों पुराने बॉयफ्रेंड को अंधा देखकर छोड़ जाती हैं. लड़का मर जाता है और लड़की के लिए अंतिम चिट्ठी छोड़ जाता है. चिट्ठी में लिखा रहता है मेरी आंखों का ख्याल रखना. लड़की के साथ-साथ पढ़ने वाले भी ‘तड़प’ के रह जाते थे


गाना इतना दर्दभर था.
 “धूप और धूल से भरी एक दोपहर थी. खिड़की के सामने अकेले बैठे थे हम. सामने लंबी, सूनी सी सड़क थी. उसपर टाइट, नीली जीन्स पहने एक लड़का साइकिल चला के जा रहा था. जीन्स की जेबें बहुत बड़ी थीं और उसमें से एक जेब में एक फ़ोन था. फ़ोन पर फुल वॉल्यूम में गाना बज रहा था- ‘आशिक तेरा भीड़ में खोया रहता है…’ और लड़का गाने में डूबा हुआ, दिल के सबसे गहरे कोने से गाना गा रहा था. चिल्लाते हुए. उसकी तड़पती हुई गगनभेदी क्रंदन किसी पत्थर दिल लड़की का भी दिल पिघला देती. लेकिन हमें गज़ब की हंसी आई. और अगले 7-8 मिनट तक आती रही.”




ये गाना उदासी का पर्याय बन गया था. वो भी इसे सुनते जिनका ब्रेकअप हो पड़ा था. और वो भी जिनका ब्रेकअप नहीं हुआ था. जो कभी रिलेशनशिप में नहीं रहे. वो उस दर्द को फील करना चाहते थे, जो एक्चुअली कभी उन्हें हुआ ही नहीं.  लड़कियां इस गाने को सुनती. अभी दोस्त बता रही थी, उसकी रूममेट रात को दहाड़े मारकर रोती. उसका बॉयफ्रेंड इस गाने की लाइंस सुनाता और वो इस बात पर पिन्नाती कि लड़के को उससे दूर रहकर कितना दर्द हो रहा है.


इस गाने ने असर क्यों किया, कीवर्ड पढ़िए, आईआईटी, सुप्रिया, रोहन राठौर, कैंसर. आईआईटी गोवाहाटी, सुनने से ही एक कायदे से इंस्टीट्यूट का नाम लगता है, आईआईटी माने वो जगह जहां उस उम्र का हर लड़का जाना चाहता था, जिस पर ऐसी कहानी असर करती है. ध्यान रहे ये चेतन भगत को जान चुकने के बाद का वक़्त था. आईआईटी के नाम में चार्म था, यही वो टाइम था जब गठ्ठर के हिसाब से बच्चे कोटा भेजे जाते थे, आईआईटी की तैयारी को. तब तमाम आकाश और एलन फाल्स सीलिंग वाले क्लासरूम्स के जरिए एक नए किस्म की दुनिया में धंसाना आसान कर रहीं थीं. माने आपने बारहवीं पास की, आईआईटी में जाना चाहते थे, आप नहीं जा पाए, आईआईटी का भौकाल है, और इंजीनियरिंग के दूसरे साल किसी आईआईटी वाले का ऐसा किस्सा सुनने को मिले तो काहे न ध्यान जाएगा.


कैंसर के नाम से हम डरते हैं. बड़ी बीमारियों के नाम पर कैंसर का बिच्छू दिखता है. मैगी से ब्रेड तक कैंसर जुड़ जाए तो हम डर जाते हैं. किसी को कैंसर की खबर से भी हम सिहर जाते हैं. ऐसे में कैंसर सुनते ही हम किसी भी ‘रोहन राठौर’ के लिए दुखी हो जाते थे. सोचिए कि रोहन राठौर इतनी सिमिट्री और सुर में नाम क्यों रखा गया? भले रहने वाले का मकसद न रहा हो, पर ये नाम इतना कैची था कि हमेशा के लिए जाकर अटक जाए. सुप्रिया नाम भी बिल्कुल वैसा ही 85 से 95 के बीच की आम सी लड़की का नाम लगता था, जो आपको मरता छोड़ जाए तो सिर्फ नाम पर दो चार एलबम निकाल देने का जी कर जाए.


एक आम से गाने को एक घटिया सी कहानी ने इतना फेमस कर डाला. आप मानो न मानो. उस टाइम में इस गाने की वैल्यू थी. इस गाने की आज भी कल्ट वैल्यू है. जाने कितनों की कैसी-कैसी अजीब सी कहानियां इस गाने से जुड़ी हैं. आज भी किसी के सामने बजा दीजिए. सिर पकड़कर कहेगा…अबे ये गाना…अरे इस गाने ने ना एक टाइम पर..



सोर्स:लल्लनटॉप



 
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28 फरवरी को विज्ञान दिवस मनाया जाता है. डॉक्टर सी.वी. रमन ने 28 फरवरी 1928 को ही फ़िज़िक्स की मशहूर खोज की थी. इस खोज के कारण वो विज्ञान का नोबेल जीतने वाले पहले एशियाई और अश्वेत वैज्ञानिक बने और उनकी खोज को रमन इफ़ेक्ट का नाम दिया गया. रमन को नाइटहुड की उपाधि भी दी गई. इसलिए वो सर सी.वी. रमन हो गए. रमन की खोज ने दुनिया को बताया कि आसमान नीला क्यों दिखता है.




तो आज समझते हैं कि सारे रंग हमें मिलकर कैसे बेवकूफ बनाते हैं. क्यों दिन का नीला आसमान सुबह और शाम को लाल हो जाता है? क्यों लड़कियां कलर मैचिंग में आदमियों से ज़्यादा टाइम लगाती हैं? और क्यों भगवान कृष्ण की तस्वीरें नीली बनाई जाती हैं? यकीन मानिए रंगों के इस पूरे खेल को समझने के बाद आप दुनिया को अलग रंग में देखने लगेंगे.


ये सारे रंग मिलकर हमें बेवकूफ बना रहे हैं



आपके सामने रखा वो सेब किस रंग का है?

 लाल दिख रहा है न, वो चाहे जिस रंग का हो मगर लाल नहीं है. ठीक ऐसे ही फेसबुक की जो पट्टी नीली दिख रही है वो चाहे जिस रंग की हो मगर नीली नहीं है. कह सकते हैं कि दुनिया में जो जैसा दिखता है बस वैसा नहीं होता. दरअसल प्रकाश का कोई रंग नहीं होता वो सात रंगों के कॉम्बिनेशन से बना होता है. ये रंगहीन प्रकाश किसी भी चीज़ पर पड़ता है तो वो चीज़ इस के सारे रंगों को अपने अंदर समेट लेती है. जो रंग नहीं समेट पाती वही पलट कर वापस निकल जाता है और हमें दिखाई देता है.


सेब पर लाइट पड़ी. सेब ने सारे रंगों को रोक लिया मगर लाल को नहीं रोक पाया. अब हमें वापस रिफ्लेक्ट होता लाल रंग दिखेगा और हम कहेंगे सेब लाल है. जबकि लाल तो वो रंग है जो सेब में नहीं है.


तो सेब का रंग क्या है? इसका जवाब निश्चित रूप से कोई भी नहीं दे सकता है. बस ये कहा जा सकता है कि वो बस लाल नहीं है.



क्यों कृष्ण का रंग नीला दिखाया जाता है



”सोहत ओढ़े पीत पट श्याम सलोने गात.” मतलब सांवले रंग के कृष्ण  पीले कपड़े पहने हुए हैं. शास्त्रों और साहित्य में कृष्ण का रंग हर जगह सांवला दिखाया जाता है. इसे समझने के लिए भारतीय दर्शन और श्री अनूप जलोटा जी की मदद लेते हैं, जिन्होनें बड़ा बेसिक सवाल पूछा कि राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला?

तो भारतीय दर्शन कहता है-

कृष्ण कौन हैं?
-जो अपने पास आने हर प्राणी को अपने अंदर समेट ले?
राधा कौन हैं?
-जिसने कृष्ण के प्रेम में संसार के हर सुख को छोड़ दिया. यहां तक कि कृष्ण को भी.


विज्ञान कहता है-



जो हर रंग को अपने अंदर समेट ले वो काला यानि कृष्ण. जिसने हर रंग को लौटा दिया वो गोरा यानी सफेद.


अब बात तस्वीरों में कृष्ण के नीले होने की. एक बहुत बड़े भारतीय पेंटर हुए हैं  राजा रवि वर्मा (जिन पर ‘रंगरसिया’ फिल्म बनी है). रवि वर्मा ने यूरोपियन शैली की पेंटिंग्स को भारतीय पौराणिक कहानियों के साथ मिलाकर पेंटिंग्स बनाईं. यूरोपियन पेंटिंग्स में तो हर किसी का रंग गोरा ही होता था. रवि वर्मा ने सांवले रंग के लिए नीले का प्रयोग किया. इन पेंटिंग्स ने देश भर में धूम मचा दी. जगह-जगह कैलेंडर और पोस्टर पर ये तस्वीरें छापी गईं और देखते-देखते ही हमारे दिमाग में कृष्ण का रंग नीला हो गया.


और हां हमारी स्किन का काला और गोरा होना रंगों के रिफ्लैक्शन पर डिपेंड नहीं करता. वो चमड़ी में मिलेनिन के कम ज़्यादा होने के कारण होता है.


फिर आसमां है नीला क्यों?



धरती से सूरज तक किरणों को आने में कुल 8 मिनट का समय लगता है. इसमें एक्स-रे, गामा, अल्ट्रावॉयलेट, माइक्रोवेव जैसी तमाम किरणें होती हैं. इनमें से ज़्यादातर धरती के वातावरण से टकराकर रुक जाती हैं. सिर्फ सफेद प्रकाश ही धरती तक पहुंच जाता है. अब इस सफेद प्रकाश में होते हैं वही तीन रंग. मगर आसमान नीला ही दिखाई देता है. रमन को इस खयाल ने परेशान किया और फिर उन्होंने इस का जवाब ढूंढ निकाला.


नीला रंग सबसे ज़्यादा भन्नाया रहता है



एक भीड़ भरी सड़क पर अगर आप धीरे से दाएं-बाएं करते हुए जाएंगे तो घर तक पहुंच जाएंगे. ऐसा ही करता है लाल रंग. लाल रंग की किरणों की फ्रीक्वेंसी सबसे कम होती है. मतलब ये किरणें सबसे धीरे और रास्ते में आने वाले धूल वगैहर से बचते हुए चलती हैं. इसी वजह से दूर तक जाती हैं. खतरे का निशान लाल इसीलिए बनाया जाता है.


 

नीले रंग की फ्रीक्वेंसी ज़्यादा होती है मतलब, भीड़ भरी सड़क पर तेज़ी से बढ़ता हुआ बंदा. रास्ते में आने वाली हर चीज़ से टकराता है और फूटकर फैल जाता है. तो बंधु, नीला रंग हमारे आसमान में मौजूद धूल वगैरह से टकराकर सबसे ज़्यादा बिखरता है और हमें दिखता है.



फिर सुबह और शाम को सूरज लाल क्यों?



सुबह और शाम को सूरज कुछ देर लाल दिखता है. फोटोग्राफर्स और कवियों के लिए नेचर ने ये व्यवस्था कर रखी है. दरअसल सुबह और शाम के इन समयों पर धरती के उस हिस्सों और सूरज की दूरी सबसे ज़्यादा होती है. अब आपको ये तो याद ही होगा कि लाल रंग सबसे दूर तक जाता है. तो सुबह-शाम कुछ देर तक इतनी दूरी होती है कि लाल रंग ही हम तक पहुंच पाता है.

औरतों को आदमियों से ज़्यादा रंग दिखते हैं



“तुम्हें तो सब एक जैसा ही दिखता है” ये बहस तो दुनिया के लगभग हर कपल में हुई होगी. आगे कभी इस तरह की बहस हो तो बता देना कि औरतें आदमियों से ज़्यादा रंग पहचान सकती हैं, ये हम नहीं कहते विज्ञान कहता है. नैश्ननल जिओग्राफिक्स की एक रिपोर्ट कहती है कि विकास के क्रम में शिकार पर गए पुरुषों को जल्दी-जल्दी और दूर भागती चीज़ों को देखना पड़ता था. धीरे-धीरे उनकी आंखें (या कहें दिमाग) इसके लिए सेट हो गईं. तो वह रंगों के बारीक फर्क में नहीं पड़ती हैं. सो इट्स साइंस बेबी.

एक आदमी और औरत के रंगों को देखने में फर्क. सोर्स- पिनट्रेस्ट

क्या हो अगर रंग ही न दिखाई दें



फेसबुक की हर थीम नीले रंग की होती है. क्योंकि मार्क ज़करबर्ग कलर ब्लाइ्ंड हैं. कलर ब्लाइंडनेस का मतलब वो बीमारी जिसमें आदमी को लाल और हरा रंग नहीं दिखता है. ये समस्या उससे कहीं बड़ी है जितनी सुनने में लगती है. आपको जो रंग बैगनी दिखाई देगा वो कलर ब्लाइंड आदमी को नीला दिखाई देगा. क्योंकि बैंगनी लाल और नीले के कॉम्बिनेशन से बनता है और कलर ब्लाइंड आदमी लाल नहीं देख सकता.

एक आम आदमी और कलर ब्लाइंड की नज़रों में फर्क. सोर्स- इज़ो.कॉम

यही है रंगबिरंगी दुनिया का किस्सा और रंगों का लल्लनटॉप विज्ञान.



सोर्स:लल्लनटॉप
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महाराष्‍ट्र की एक जगह है जहां खबरें भी नहीं पहुंचती। यह जगह है नंदुरबार की अकरानी तालुका में बना छोटा सा गांव रोशामल खुर्द। यहां रहने वाले ग्रामीण देश के पीएम मोदी को नहीं जानते और उनके लिए देश पर अब भी इंदिरा गांधी की बेटी सोनिया गांधी राज कर रही हैं।



यहां के लोगों से जब नोटबंदी को लेकर सवाल किए गए तो उन्‍होंने आश्‍चर्य जताया कि 500 और 1000 के नोट भी छपते हैं। एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक जहां देशभर में नोटबंदी से बवाल मचा हुआ है वहीं इस गांव के लोगों ने तो अब तक 500 और 1000 का नोट देखा तक नहीं है। आदिवासी गांव में लोगों को लगता है कि देश पर अब भी इंदिरा गांध की बेटी सोनिया गांधी जो असल में उनकी बहू हैं का राज है।



कांग्रेस सत्‍ता में है और मोदी का नाम गांव में कोई नहीं जानता। इस गांव के लोगों को बैंक और एटीएम तो छोड़ सड़क और बिजली तक नहीं मिली है। गांव की महिला टुडकी बाई से जब नोटबंदी और दूसरी चीजों पर बात की गई तो उसने कहा उसे कुछ समझ नहीं आ रहा। गांव के ही देविदास यहां से 100 किमी दूर स्थित धडगांव में अपनी उपज बेचने नहीं जा रहे।



उनके अनुसार पहले जिस मक्‍का और ज्‍वार का भाव 13-15 रुपए किलो मिलता था अब वो 10 रुपए किलो बिक रहा है। गांव में आने-जाने के साधन नहीं हैं जिसके चलते बाइक या फिर कभी कभार आने वाली जीप से लोग सफर करते हैं। जब उनसे नोटबंदी को लेकर पूछा गया तो उन्‍होंने कहा लोगों को 2 हजार रुपए की क्‍या जरूरत है हमारे पूरे घर का खर्च 1500 रुपए है।



गांव के एक युवक के अनुसार हर चुनाव में यहां चुनाव की पर्ची के साथ 100 रुपए का नोट आता था और लोग उस चुनाव चिन्‍ह पर वोट दे देते थे। लेकिन अब यहां कई पर्चियां आती हैं जिनमें 100 के नोट होते हैं। यहां लोगों को यह तक नहीं पता की कांग्रेस के चुनाव चिन्‍ह की जगह कमल का फूल कैसे आ गया।



कुछ का मानना है कि इंदिरा गांधी ने नया चुनाव चिन्‍ह अपना लिया है। टुडकी बाई ने कहा कि वो बंद हो चुके पुराने नोट देखना चाहती है और सरकार को संदेश भेजा है कि वो पुराने नोट उनके पास भेजें ताकि वो देख सकें कि वो कैसे थे।




सौर्स:न्यूज़24
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कश्मीर में श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में एक इमारत है. रोज़ाबल नाम की. इस जगह के इतिहास में ऐसे लोगों की भी दिलचस्पी है, जो कश्मीर के भूगोल में कोई इंट्रेस्ट नहीं रखते. दावा किया जाता है कि ये रोज़ाबल श्राइन, ईसामसीह की कब्र है. वैसे रौज़ा का अर्थ होता है कब्र और बल का मतलब जगह होता है.


रोज़ाबल की कहानी में कई रोचक पेंच हैं. उनकी बात करने से पहले ये बता दें. ईसा मसीह के जीवन से जुड़ी तीन ऐसी घटनाए हैं जिनपर कई कॉन्सपिरेसी थ्योरीज़ हैं.



ईसा मसीह की 13 से 30 साल की उम्र के बीच की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. कई लोग दावा करते हैं कि इस बीच वे हिंदुस्तान आए और बुद्ध के प्रभाव में रहे. ईसा की शिक्षाओं में कई जगहों पर बुद्ध की बातों के साथ समानताओं को इसका आधार बनाया जाता है.



दूसरी थ्योरी उनके मैरी मेग्डैलिन से विवाह, उनकी एक संतान होने और उसकी रक्षा ‘प्रायरी ऑफ ज़ायान’ नाम के संगठन के द्वारा किए जाने की है. इस पर प्रसिद्ध लेखक डैन ब्राउन किताब लिख चुके हैं. द विंची कोड नाम की इस किताब पर इसी नाम से फिल्म बनी है. इसके बाद से ये थ्योरी काफी चर्चित हुई है.



तीसरी कहानी ईसा को सूली पर चढ़ाए जाने को लेकर है. ईसाई मान्यताओं के मुताबिक ईस्टर के दिन ईसा का पुनर्जन्म हुआ था. यहां तक तो कोई समस्या नहीं है. मगर ट्विस्ट इसके बाद आता है. ईसाई मानते हैं इसके बाद वो स्वर्ग चले गए और संशयवादी मानते हैं कि वो एशिया में जाकर गुमनाम ज़िंदगी बिताने लगे. इस धारणा के पीछे का तर्क है कि भारत में ईसाइयत लगभग 2,000 सालों से है. मतलब ईसा को सूली पर लटकाए जाने के तुरंत बाद से.




अब बात रोज़ाबल की. स्थानीय निवासी कहते हैं कि ये युज़ असफ की कब्र है. युज़ असफ, अहमदिया मुस्लिमों का ईसा को दिया गया नाम है. इन धारणाओं के कारण अहमदिया मुस्लिम, बाकी मुसलमानों के निशाने पर रहा है.


वैसे रोज़ाबल की इमारत में शियाओं के 8वें इमाम मूसा रज़ा के वंशज, संत मीर सैय्यद नसीरुद्दीन की भी मज़ार है और इसकी देखभाल सुन्नियों का एक बोर्ड करता है. इस इमारत में एक पत्थर भी है. इस पत्थर पर दो बीच से छेदे गए पैरों की छाप है. इसके अलावा कब्र इस्लामिक नहीं यहूदी कायदों से बनी है.


रोज़ाबल के अंदर


रोज़ाबल श्राइन की एक और विचित्र बात ये है कि इसका कोई भी ज़िक्र कश्मीरी बौद्ध इतिहास में नहीं मिलता है. इतिहास में पहली बार इसकी चर्चा 1747 में हुई. जब श्रीनगर के सूफी लेखक ख्वाजा मोहम्मद आज़म ने अपनी किताब ‘तारीख आज़मी’ में लिखा कि ये मज़ार एक प्राचीन विदेशी पैगम्बर और राजकुमार युज़ असफ की है.


छेद वाले पैरों की छाप


इसके बाद 1770 में इसके बारे में एक मुकदमे का फैसला सुनाते हुए मुल्ला फाजिल ने कहा.

सबूतों को देखने के बाद, ये नतीजा निकलता है कि राजा गोपदत्त, जिसने सोलोमन का सिंघासन बनवाया, के समय युज़ असफ घाटी में आए थे. मर कर ज़िंदा होने वाले उस महान शहजादे ने दुनियावी चीज़ों को छोड़ दिया था. वो अपना पूरा ध्यान सिर्फ इबादत में लगाता था. कश्मीर के लोग, जो हज़रत नूह के बाद बुतपरस्त बन गए थे. उन्हें उसने ऊपर वाले की इबादत करने के लिए कहा. वो एक ही ऊपर वाला होने की बात कहते रहते थे. बाद में इस मज़ार में सैय्यद नसीरुद्दीन को भी दफनाया गया.
इस आदेश के अनुवाद के समय इसमें बुद्ध का भी ज़िक्र आ गया. बाद में कहा गया कि ये संस्कृत और फारसी के बीच पैदा हुए भ्रम के कारण हुआ था.


कहा जाता है कि1965 की जंग के दौरान इसको नष्ट करने की भी कोशिश हुई, मगर इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है.


लेखक अश्विन सांघी इस पर ‘रोज़ाबल लाइन’ के नाम से उपन्यास लिख चुके हैं. वहीं BBC चैनल 4 ने ‘हिडन स्टोरी ऑफ जीसस’ के नाम से एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई. इसमें रोज़ाबल के अंदर की फुटेज भी दिखाई गई. डॉक्युमेंट्री में जहां युज़ असफ के ईसा होने की संभावना को खुला रखा गया, वहीं BBC के कुछ लोगों ने कहा इस कहानी में स्थानीय व्यापारी मसाला मिलाकर परोस रहे हैं ताकि विदेशी वहां घूमने आएं.


इन सबमें सच कितना है और कितना कल्पना की मिलावट है पता नहीं मगर ये इतिहास की अभी तक एक न सुलझने वाली रोचक पहेली ज़रूर है.







सौर्स:लल्लनटॉप
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